चिराग़ तले अंधेरा, फिर भी पत्रकारिता का दंभ

पत्रकारिता दिवस 30 मई पर विशेष



एक कहावत है “चिराग तले अंधेरा” ऐसा लगता है कि यह कहावत आज की पत्रकारिता और उसके पत्रकारों के लिए ही बनी है. मुझे नहीं लगता कि पत्रकार की पहचान उसके (पत्रकारिता नहीं) कभी जुझारूपन/लड़ाकूपन की वजह से ही रही हो. भ्रष्टाचार का भांडा फोड़ना, खबरों के पीछे भागना, खोजी पत्रकार का तमगा हासिल करना उसकी पेशागत मजबूरी है तो समाचार पत्रों की आवश्यकता. लगभग इसी श्रेणी में सनसनीखेज खुलासा/ख़बरें होती हैं.


लड़ाकू क्यों नहीं होते पत्रकार ?


पत्रकारिता में आज भी कुलीन वर्ग हावी है. चूंकि आजादी की लड़ाई से लेकर आज तक दबे-कुचले लोगों की भूमिका भी दबी-कुचली रह गई इसलिए आज की पत्रकारिता भी दबी-कुचली है. अखबार में या यूं कहें मीडिया में वही छपेगा, वही दिखाई देगा जितना संपादक (मालिक/मैनेजर) चाहेगा. क्या एक भी समाचार या चैनल अपने मालिक के खिलाफ, उसके गोरखधंधे के खिलाफ एक भी लाइन लिख सकता है ? कोई खबरिया चैनल कुछ दिखा सकता है ? नहीं. इसका मतलब यह नहीं कि मालिकों के गोरखधंधे नहीं होते. पत्रकारों की आजादी खूंटे में बंधी गाय की तरह है. जितनी रस्सी ढीली होगी उतना ही चरने का दायरा बढ़ेगा.


बात पत्रकारों के जुझारूपन की. तो कार्ल मार्क्स ने ये क्यों कहा कि, “दुनिया के मजदूरों एक हो.” मार्क्स ने किसानों का आह्वान क्यों नहीं किया ? अन्य जाति या समुदाय का क्यों नही किया ? उनका मानना था कि, “सर्वहारा ही क्रांति कर सकता है क्योंकि उसके पास पाने को तो बहुत कुछ है पर खोने को कुछ भी नहीं.” यही बात पत्रकारों पर भी लागू होती है. निम्न वर्ग के लोग पत्रकारिता में शुरू से नहीं रहे, उच्च वर्ग के आएंगे नहीं तो मध्यम वर्ग के लोग ही रहेंगे. रही बात मध्यम वर्ग की तो यह सुविधा भोगी वर्ग आंदोलन से हमेशा दूर रहा है. आंदोलन में शामिल होता है अंत में और टूटता है सबसे पहले.


अब चूंकि यह वर्ग ही पत्रकारिता में समाया हुआ है तो नतीजा भी वही होगा. अखबार और खबरिया चैनलों के कर्मचारी हड़ताल क्यों नहीं करते ? “हर जोर-जुलुम की टक्कर में हड़ताल हमारा नारा है”, संबंधित खबरें तो अखबारों और चैनलों पर रोज रहती है, पर पत्रकारों के दमन, उत्पीड़न वह शोषण की खबरें क्यों नहीं रहतीं ? हर मिल, कारखाना, फैक्ट्री के मालिक अपने कर्मचारियों का शोषण करते हैं. क्या् मीडिया के मालिकाना नहीं करते ? यदि करते हैं तो उसकी खबरें क्यों नही रहतीं ? क्या यह चिराग तले अंधेरा” वाली बात नहीं है ?


आवश्यक सेवाओं में शामिल न होने के बाद भी अखबारों/खबरिया चैनलों में हड़ताल क्यों नहीं होती ? जबकि अस्पतालों, जल संस्थानों आदि में होती है. इस पर शोध होना चाहिए. सरकारी नौकरी का बाबू भी तो मध्यमवर्गीय परिवार का होता है. बहरहाल….


मीडिया के लिए मानक क्यों नहीं ?


हर चीज के लिए मानक है तो मीडिया के लिए क्यों नहीं ? हम डिग्री कॉलेज, मेडिकल कालेज, अस्पताल-नर्सिंग होम खोलना चाहें तो उसके नियम-कायदों को पूरा करना पड़ता है, उसकी समय-समय पर जांच होती है. मसलन डिग्री कॉलेज के लिए यूजीसी के और मेडिकल कालेज, अस्पताल-नर्सिंग होम के लिए मेडिकल एसोसिएशन के निर्देश पर चलना होगा. आपरेशन थियेटर के लिए नियमों का पालन करना होता है, इसकी समय-समय पर जांच भी होती है, पर मीडिया छुट्टे सांड की तरह मुंह मारने को आजाद होता है. उसके लिए कोई नियम-कानून नहीं, चाहे जितने संस्करण निकालो, चाहे जितने पेज बढ़ाओ-घटाओ, चाहे जितने कर्मचारी रखो, जब चाहे जितनी छंटनी करो. मतलब अखबार नहीं खाला जी का घर हो गया.


अपने मालिकों से कुछ क्यों नहीं मांगते ?


आये दिन पत्रकार सरकार के सामने कटोरा फैलाये रहते हैं. आज हिंदी पत्रकारिता दिवस है. आज भी यानि देश की आजादी के 70 साल बाद भी पत्रकार सरकार के सामने झोली फैलाए रहते हैं. 30 मई को अपने-अपने जिलों में देखिएगा. पत्रकारिता दिवस पर आयोजित समारोह में मंत्री को बुलाएंगे और कहीं सरकारी मान्यता की बात करेंगे तो कहीं अस्पतालों में मुफ्त इलाज की, सरकारी आवास की, मुफ्त बीमा योजना की. पत्रकार और पत्रकार संगठन अपने मालिक से सुविधाएं क्यों नहीं मांगता ? सरकार सेवा प्रदाता है क्या ? अपने मालिक से सुविधाएं मांगने में फटती है क्या ?


क्या कोई पत्रकार या संघ, पत्रकारिता दिवस के अवसर पर सरकार से यह सवाल करने का साहस करेगा कि उसकी सरकार ने मजीठिया वेतन आयोग की रिपोर्ट को अब तक क्यों नहीं लागू कराया ?


सरकारी कर्मचारियों के वेजबोर्ड और पत्रकारों के वेज बोर्ड में अंतर क्यों ?


वेतन आयोगों का गठन कब से हुआ और क्यों हुआ फिलहाल इसका इतिहास नहीं मालूम, हश्र जरूर जरूर देख रहा हूं। एक कार्यालय के बाहर प्रेसकर्मियों की हड़ताल चल रही थी. एक छात्र नेता भाषण वाले अंदाज में नरिया रहे थे कि “मालिकों को पालेकर देना होगा, और अभी देना होगा…”, गोया पालेकर कोई वस्तु हो जो मालिकों ने तिजोरी में बंद कर रखी हो. बहरहाल किसी अखबार के दफ्तर के बाहर सभा तो हुई. आज भी वेज बोर्ड का सवाल है, कहीं से कोई आवाज नहीं उठा रही है, क्यों ?


हम भारी पत्थर को तोड़ नहीं सकते हैं तो दरार तो डाल ही सकते हैं ताकि आनेवाली पीढ़ी सबक ले दरार से. अब तक पत्रकारों के लिए कई वेतन आयोगों का (पालेकर, बछावत व मणिसाणा) गठन किया गया, लेकिन नतीजा ? ढाक के तीन पात रहा. मजीठिया पहला वेजबोर्ड है जिसने अब तक की सबसे ज्यादा दूरी तय की.


वेतन आयोगों का सिर्फ पत्रकारों व गैर-पत्रकारों के लिए ही नहीं किया जाता. केंद्र सरकार के कर्मचारियों के लिए भी हर 10 साल पर वेतन आयोग का गठन किया जाता है. केंद्र में लागू होते ही राज्य सरकारें उसे (अपनी माली हालत के अनुसार) लागू करतीं है. हां, देर-सबेर हो जाए यह दीगर बात है. ऐसा अक्सर देखा गया है कि राज्यकर्मियों को पहले तो निगम कर्मियों को थोड़ा बाद मेंं मिलता रहे. यहीं पर यह सवाल जरूर उठता है कि जब सरकारी कर्मचारियों को वेजबोर्ड के अनुसार वेतन और अन्य परिलाभ बिना कोर्ट-कचहरी के आसानी से हासिल हो जाता है तो फिर पत्रकारों को क्यों नहीं हासिल होता ? वेज बोर्ड के लिए अनुभवी सीए से धनराशि की गणना कराइए, अपने-अपने राज्यों के श्रमायुक्त (एल. सी.) के यहां क्लेम दाखिल करिए. श्रमायुक्त महीने भर बाद उपश्रमायुक्त को भेजेंगे, हफ्ते दो हफ्ते बाद प्रकरण सहायक श्रमायुक्त को भेजा जाएगा. सहायक श्रमायुक्त प्रक्रिया के अधीन कार्रवाई शुरू करेगा. वो सुनवाई के लिए दोनों पक्षों को बुलाएगा. कोई भी एक पक्ष आसानी से डेट पर डेट लेता रहेगा और सहायक श्रमायुक्त देते रहेंगे, वो भी लंबी-लंबी. अब श्रम विभाग के कार्यक्षेत्र को जाने.


श्रम विभाग का काम मालिक और मजदूरों के मामले को सुनना है. इसका मतलब यह नहीं कि श्रम विभाग से ही मामला निपट जाएगा. श्रम विभाग में सुनवाई के दौरान मामला निपट गया (जो कि निपटता नहीं) तो ठीक, नहीं तो वह (नियम 17 एक या दो या औद्योगिक विवाद अधिनियम के तहत ) श्रम न्यायालय भेज दिया जाएगा. अब कोर्ट में मामला कितना खींचता है या खींचा जा सकता है, शायद ही यह किसी से छिपा हो. और हां यदि कोर्ट में कोई वादा भेज दिया गया हो तो इसका मतलब यह नहीं कि मामला निपट ही जाएगा.