काले धन की गोपनीयता से बचाते धनकुबेर
नई दिल्ली। विदेशी बैंकों में भारतीयों के कालेधन को लेकर वर्षों से मामला गरमाता रहा है। देश की जनता जानना चाहती है कि आखिर कौन लोग हैं जो नियम-कायदों को धता बताते हुए देश का पैसा विदेशी बैंकों में भर रहे हैं और अमीर बनते जा रहे हैं। लेकिन ऐसा करने वालों के नाम कभी उजागर नहीं हो पाए।

जब-जब सरकार से इस बारे में जानकारी मांगी जाती है, वह गोपनीयता का हवाला देकर कोई भी जानकारी देने से मना कर देती है। हाल में सूचना के अधिकार के तहत दायर एक आवेदन में कालेधन से जुड़े मामलों में कार्रवाई की जानकारी मांगी गई थी। लेकिन सरकार ने मना कर दिया। वित्त मंत्रालय का कहना है कि कालेधन के बारे में अब तक जो जानकारी स्विटजरलैंड से मिली है, उसे गोपनीयता शर्तों के कारण साझा नहीं किया जा सकता। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है।

आरटीआइ के तहत पहले भी इस तरह की अर्जियां डाली गर्इं, लेकिन सरकार हमेशा मना करती रही। सरकार का गोपनीयता का तर्क अपनी जगह है, लेकिन ऐसे मामलों में अगर कोई मांगी गई जानकारी नहीं मिलती तो इससे संदेह ही पैदा होता है। लगता है सरकार असलियत को छुपा रही है।कालेधन का मुद्दा हमेशा से संवेदनशील रहा है। खासकर आम चुनाव आते हैं, यह मुद्दा बोतल के जिन्न की तरह बाहर निकल आता है। सारे राजनीतिक दल कालेधन के मुद्दे को जोरशोर से उठाते रहे हैं, एक-दूसरे पर आरोप मढ़ते रहे हैं, और हर दल यही वादा करता रहा है कि सत्ता में आते ही वह विदेश में जमा कालाधन वापस लाएगा। आम जनता के लिए कालेधन का मसला भ्रष्टाचार जितना ही महत्त्वपूर्ण है। लोगों का मानना है कि अगर भारत इन दोनों समस्याओं से पार पा जाए तो देश में खुशहाली आ सकती है। यही चुनावी घुट्टी लोगों को पिलाई जाती है। लेकिन उम्मीदें तब टूटती हैं, जब न विदेशों में कालाधन रखने वालों के नाम उजागर होते हैं न ही यह पता चलता है कि ऐसे आर्थिक अपराधियों के खिलाफ क्या कदम उठाए जा रहे हैं।

पिछले आमचुनाव में लोगों को सपना दिखाया गया था कि कालाधन वापस लाया जाएगा और हरेक नागरिक के खाते में पैसे डाले जाएंगे, क्योंकि जो पैसा विदेशीबैंकों में जमा है वह देश की जनता का है। लेकिन क्या ऐसा हकीकत में हुआ?

इसलिए अगर सरकार गोपनीयता के नाम पर कोई जानकारी नहीं देती है तो संदेह और पुख्ता होते हैं। यह संदेश जाता है कि कहीं न कहीं ऐसे लोगों को बचाया जा रहा है जो भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। आम धारणा यही है कि कर चोरी के जरिए जमा बिना हिसाब-किताब वाला पैसा कालाधन है और लोग उसे ऐसे दूसरे मुल्कों में सुरक्षित रखते हैं जहां कर कानून उदार और आसान हैं। कानून की नजर में ऐसे लोग आर्थिक अपराधियों की श्रेणी में आते हैं। तो फिर ऐसे लोगों के नाम उजागर होने में क्या दिक्कत होनी चाहिए? हालांकि सर्वोच्च अदालत ने कालेधन की जांच के लिए समिति भी बनाई थी, विशेष जांच दल को इसकी जांच भी सौंपी गई, कार्रवाई की दिशा में कदम भी बढ़े, लेकिन आज तक कोई नतीजा सामने नहीं आया। यह भी हैरान करने वाली बात है कि वित्त मंत्रालय को इस बात का अनुमान ही नहीं है कि अर्थव्यवस्था में और इसके बाहर कितना कालाधन चलन में है। इसलिए कालेधन की समस्या से निपटने में सरकार के प्रयास निराश करने वाले ही हैं।