भ्रष्टाचार में राजनीतिक हस्तक्षेप सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती
 



 

नई दिल्ली।सुप्रीम कोर्ट दो बार दखल देने के बावजूद भ्रष्टाचार के मामलों में राजनीतिक हस्तक्षेप अब भी मौजूद है. सरकार ने प्रावधान किया है कि किसी भी जनसेवक की जांच से पहले सीबीआई सरकार से अनुमति लेगी. कोर्ट ने इस प्रावधान को दो बार रद्द किया लेकिन भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (पीसीए) में संशोधन करके 'सरकारी दिशानिर्देश' (Single Directive) के रूप में यह अब भी बना हुआ है.

राजनीतिक चर्चाओं में भ्रष्टाचार की जगह भले ही कम हो गई हो, लेकिन एक विश्वसनीय और स्वतंत्र भ्रष्टाचार विरोधी तंत्र के लिए भारत देश का संघर्ष अभी जारी है. देश में आखिरी भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन अन्ना हजारे के नेतृत्व में हुआ था और इस आंदोलन के बाद भ्रष्टाचार पर निगाह रखने के लिए एक सर्वोच्च संस्था लोकपाल वजूद में आया. हालांकि, लोकपाल और लोकायुक्त कानून 2013 को पांच साल बाद अधिसूचित किया गया. लेकिन अब भी इसने काम करना शुरू नहीं किया है और इसे क्रियाशील बनाने की प्रक्रिया चल रही है.

इस बीच, हाल ही में प्रमुख भ्रष्टाचार विरोधी जांच एजेंसी सेंट्रल ब्यूरो आफ इनवेस्टीगेशन (सीबीआई) में घमासान मच गया और यह झगड़ा इतना बढ़ा कि सरकार ने आधी रात को स्ट्राइक कर दी और इसके चलते यह चहारदीवारी से बाहर आ गया. एजेंसी के निदेशक और विशेष निदेशक के बीच कानूनी अखाड़ा अब भी खुला हुआ है. इससे सीबीआई की छवि धूमिल हो चुकी है. भ्रष्टाचार से लड़ना फिलहाल भले ही एजेंडे में न हो, लेकिन यह समझदारी नहीं होगी कि भ्रष्टाचार के किसी अगले शर्मनाक स्कैंडल का इंतजार किया जाए और फिर से एक मजबूत और राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त भ्रष्टाचार विरोधी तंत्र बनाने की मांग उठने लगे.

ट्रांसपैरेंसी इंटरनेशनल के भ्रष्टाचार सूचकांक में भारत कई वर्षों से बना हुआ है. इस सूचकांक में 0 (भ्रष्टतम) से 100 (पूरी तरह पारदर्शी) के बीच भारत का स्कोर मात्र 40 है.

सरकारी दिशानिर्देश: शासकीय आदेशों से कानून तक

भ्रष्टाचार से लड़ने के मामले में 'सिंगल ​डायरेक्टिव' नाम से कुख्यात 'सरकारी दिशानिर्देश' हमेशा बाधा साबित हुआ है. जब भी जनसेवकों की जांच की बात आती है तो अवांछनीय राजनीतिक हस्तक्षेप इसे रोक देता है. 1997 से अब तक सुप्रीम कोर्ट ने दो बार रद्द किया है, लेकिन नये स्वरूप में अब भी वह कानून मौजूद है जो छोटे-बड़े सभी जनसेवकों का बचाव करता है.

पारंपरिक अर्थ में समझें तो केंद्र सरकार ने सीबीआई को कुछ दिशानिर्देश दिए हैं कि संयुक्त सचिव या उससे ऊपर के अधिकारी, जो निर्णय लेने वाले पदों पर हैं, उनकी जांच करने के लिए एजेंसी को सरकार से अनु​मति लेनी होगी. पहली बार यह कानून 1969 में आया और इस पर काफी बवाल हुआ. दूसरी बार, 1988 में बोफोर्स घोटाले के बाद सरकार ने निर्देश जारी किया कि सीबीआई भ्रष्टाचार के मामले में कोई जांच करने से पहले सरकार से अनुमति लेगी.

करीब एक दशक बाद 1997 में हवाला कांड सामने आया जिसमें जैन डायरी के जरिये पता चला कि पैसे के अवैध लेनदेन में कई बड़े नेता शामिल हैं. इस केस की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रावधान को खत्म कर दिया कि सीबीआई को किसी अधिकारी की जांच करने के लिए सरकार की अनुमति लेनी होगी. सुप्रीम कोर्ट का कहना था कि यह प्रावधान अधिकारियों के खिलाफ संज्ञेय अपराधों की जांच में बाधा बनेगा और 'न्याय' को हतोत्साहित करेगा. इसके अलावा यह निर्णायक पदों पर बैठे अधिकारियों को विशेषाधिकार देता है जो कि अनुच्छेद 14 के समानता के अधिकार का उल्लंघन है.

कुछ साल बाद, सेंट्रल विजिलेंस कमीशन (सीवीसी) एक्ट-2003 आया और उसमें फिर से यह प्रावधान कर दिया गया. इस सीवीसी एक्ट को डेल्ही स्पेशल पोलिस स्टैबलिशमेंट एक्ट 1946 में सुधार के साथ लाया गया, जो सीबीआई को कानूनी आधार और जांच की पॉवर मुहैया कराता था. इसमें कहा गया कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 के तहत हुए किसी अपराध की जांच सीबीआई बिना केंद्र सरकार की अनुमति के नहीं कर सकती.

यह सुधार इसलिए संभव हो सका क्योंकि हवाला कांड से जुड़े कोर्ट के फैसले में सीवीसी को कानूनी आधार देने और सीबीआई की कार्यप्रणाली की देखरेख की जिम्मेदारी देने के बारे में भी कहा गया था, ताकि राजनीतिक हस्तक्षेप रोका जा सके. तब से सीबीआई सरकार के नियंत्रण में ही है. इसके साथ ही सीबीआई को 'सरकारी दिशानिर्देश' को कानूनी आधार मिल गया.

2004 में इसे तत्काल कोर्ट में चुनौती दी गई लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे रद्द करने में एक दशक लगा दिया. 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने हवाला कांड का ही तर्क दोहराया. इस फैसले में कहा गया कि “सीबीआई को मिला यह सरकारी दिशानिर्देश न तो सार्वजनिक अनियमितताओं को दूर करने में कामयाब हुआ है और न ही जनहित में कुछ हासिल कर सका है. बल्कि, यह सार्वजनिक अनियमितताओं को बढ़ावा देता है और चोर-दरवाजों को सुरक्षित करता है. यह प्रावधान भ्रष्ट जनसेवकों को पकड़ने में स्वतंत्र, निर्बाध, पूर्वग्रह-मुक्त, सक्षम और निर्भय होकर जांच को प्रभावित करता है.”

भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम में फिर बदलाव

चार साल बाद, 2018 में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम में बदलाव के साथ यह कानून फिर से वजूद में आ गया है. इस कानून में एक धारा (17A) जोड़ी गई है जो कहती है कि जिस दौरान कोई अधिकारी नियुक्ति पर रहा हो, उस दौरान हुए कथित अपराध की जांच बिना पूर्व अनुमति के नहीं की जा सकती.

इस संशोधन ने पहले से चले आ रहे 'सरकारी दिशानिर्देश' (singe directive) की अवधारणा ही बदल दी. इस कानून ने संयुक्त सचिव या उससे ऊपर के अधिकारियों को बचाने की जगह हर रैंक के अधिकारियों को कवच मुहैया करा दिया.

2014 के फैसले में सरकार से 'पूर्वानुमति' के बारे सुप्रीम कोर्ट ने जो कहा था, यहां उस पर गौर करना उचित होगा कि “पूर्वानुमति का मतलब होगा कि जिस अधिकारी के खिलाफ जांच होनी है, उसे यह पता चल जाएगा कि उसकी जांच होने जा रही है. दूसरे, अगर सीबीआई को यह अधिकार नहीं है कि वह प्राथमिक जांच पड़ताल करके शिकायत की पुष्टि कर सके, तो अभियोजन आगे कैसे बढ़ेगा?” प्राथमिक जांच का म​कसद यह सुनिश्चित करना है कि जिस बारे में शिकायत मिली है, क्या प्रथमदृष्टया वह जांच का मामला बनता है या नहीं.

2018 में इस संशोधन को भी चुनौती देने के लिए फिर से एक जनहित याचिका दायर की गई. यह भी ध्यान में रखना जरूरी है कि सीबीआई अगर कोई दूसरे केस भी लेती है, जो भ्रष्टाचार से जुड़े हैं और जिनकी जांच भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत होनी है, तो उसकी जांच इस दिशानिर्देश से सीधी प्रभावित होगी.

सबसे जरूरी बात तो यह है कि लोकपाल का पूरा अधिकार क्षेत्र भ्रष्टाचार के उन मामलों तक सीमित कर दिया गया है जो भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत आते हैं और 'सरकारी दिशानिर्देश' से सीधे प्रभावित होंगे. इस तरह इस 'सरकारी दिशानिर्देश' (singe directive) का प्रभाव बहुत व्यापक है. भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए सबसे पहली जरूरत है कि जितना जल्दी हो सके इसे किसी विश्वससनीय ढांचे के तहत लाया जाए.