चौरसिया समाज की जांबांज बेटी अंधेरी दुनियां को बदल रही प्रकाश की दुनियां


 यह ज़िंदादिल लड़की हार मानने के लिए बनी ही नहीं है.  यह लड़की चौरसिया समाज की जांबांज बेटी है. यह बेटी काली अंधेरी दुनियां के ऐसी बेटियों को प्रकाश की दुनियां का राह दिखा रही है, जिसे लोग अपनी छाया तक नहीं पड़ने देना चाहते। चौरसिया समाज को ऐसी बेटी पर गर्व है, जो एक अदद क्रांति का इतिहास सृजन कर रही है। उसके गुरुत्व में कई ऐसी लड़कियों को जीवन दान ही नहीं मिला, बल्कि वह दुनियां के देशों में अपनी प्रतिभा का परचम लहरा रही है।


" प्रख्यात वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग ने कहा था की हर महान कलाकार, दार्शनिक, वैज्ञानिक के पीछे एक शिक्षक होता है. जीवन कितनी ही कठिन क्यों न हों, पर्दे के पीछे से शिक्षक हमें आगे का रास्ता दिखाते हैं। "


पिछले काफ़ी समय से वे क्रांति नामक एनजीओ द्वारा मुंबई की बदनाम गलियों में पल रही लड़कियों को नई राह दिखाने का काम कर रही हैं. वे उन गलियों में बदलाव ला रही हैं, जहां जाने के बारे में हममें से ज़्यादातर लोग सोच भी नहीं सकते. 
''इनमें से कई लड़कियों ने ऐसी भयावह स्थितियों का सामना किया है, जिनके निशां अभी भी उनके दिलो-दिमाग़ पर बाक़ी हैं. हालांकि इन लड़कियों में कुछ नया सीखने और आगे बढ़ने का जज़्बा भी है,''  रॉबिन कहती हैं कि उन्होंने क्रांति के पाठ्यक्रम में पांच 'सी' (सीज़) का समावेश किया है: कम्यूनिकेशन स्किल्स (संवाद कुशलता), क्रिएटिव थिंकिंग (रचनात्मक सोच), क्रिटिकल अनैलिसिस (समालोचनात्मक विश्लेषण), कम्यूनिटी ऑर्गैनाइज़िंग (सामाजिक सुनियोजन) और कम्पैशन (संवेदना). हफ़्ते के विभिन्न दिन विभिन्न चीज़ें सिखाई जाती हैं और वो भी रोचक कॉन्सेप्ट्स के साथ, जैसे-म्यूज़िक मंडेज़, टेड-टॉक ट्यूज़डेज़, थिंकिंथ थर्स्डेज़ इत्यादि.   
रॉबिन ने क्रांति की शुरुआत 10 वर्ष पहले बानी दास, त्रिना तालुकदार और माया जवेरी के साथ की थी. इस समय क्रांति के साथ 12 से 21 वर्ष की कई लड़कियां हैं. रॉबिन उन्हें  'क्रांतिकारी' कहती हैं. ''इनमें से एक लड़की संगीत सीखने के लिए यूएस गई थी, क्योंकि भारत के सभी म्यूज़िक स्कूल्स ने उसे अपने यहां दाख़िला देने से इनकार कर दिया था. अब वह पुणे में म्यूज़िक थेरैपी सिखाती है. एक दूसरी लड़की ने स्ट्रीट थिएटर ग्रुप शुरू किया है. यह ग्रुप मानव तस्करी, देह व्यापार, लैंगिक हिंसा जैसे विषयों पर आधारित नाटक करता है,''  
पिछले वर्ष रॉबिन को प्रतिष्ठित ग्लोबल टीचर प्राइज़ के लिए नामांकित किया गया था. दुनियाभर की 8,000 प्रविष्टियों में उन्हें 10 फ़ाइनलिस्ट्स में चुना गया था.वह कहती हैं ''मेरे काम को पहचान मिल रही है, यह मेरे लिए बड़े सम्मान की बात है. ये लड़कियां भी बेहद उत्साहित थीं.'' भले ही रॉबिन वह पुरस्कार न जीत पाई हों, लेकिन जब स्टीफ़न हॉकिंग ने उनका नाम फ़ाइनलिस्ट की सूची में उद्घोषित किया तब सोशल मीडिया पर क्रांति, रॉबिन और उनकी क्रांतिकारियों के नाम ट्रेंड होने लगे थे. 
फ़िलहाल रॉबिन व्यक्तिगत दानदाताओं और सहयोग करनेवालों की मदद से क्रांति का संचालन कर रही हैं. वह बताती हैं कि ''हम एक ऐसी जगह पर रहते हैं, जहां इन सभी लड़कियों को एक ही टॉयलेट साझा करना पड़ता है. पर हमारी राह में सबसे बड़ी बाधा आर्थिक तंगी नहीं, लोगों के तंग दिमाग़ हैं.'' 
वे आगे बताती हैं,''घर पाने के लिए हमें कभी-कभी झूठ बोलना पड़ता है कि हम लोग अनाथ बच्चों के लिए काम करते हैं, लेकिन जैसे ही बिल्डिंग वाले सच से रूबरू होते हैं, हर कोई चाहता है कि हम वहां से चले जाएं.'' यही कारण है कि पिछले चार वर्षों में क्रांति को चार घर बदलने पड़े हैं. ''लोगों की इस मानसिकता से हमारी लड़ाई चलती रहेगी. मुझे पूरी उम्मीद है कि इन लड़कियों में से हर कोई अपनी राह खोज ही लेगी.'