देव सूर्यमंदिर अपने ऐतिहासिक गर्भ में समेटे है अनेक रहस्यों को

अनेक रहस्यों का केंद्र देव स्थित सूर्यमंदिर


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बिहार स्थित सूर्य तीर्थ देव का पश्चिमाभिमुखी सूर्यमंदिर अनेक रहस्यों का केंद्र है। कुछ लोग आज भी इस मंदिर को विश्वकर्मा द्वारा निर्मित मानते हैं। बहरहाल, आज भी यह सूर्य प्राचीन मंदिर अपने प्राचीन मूल स्वरूप में स्थित है और करोड़ों सूर्यभक्तों का आस्था का केंद्र भी है।


देव मंदिर में सात रथों से सूर्य की उत्कीर्ण प्रस्तर मूर्तियां अपने तीनों रूपों उदयाचल (प्रात:) सूर्य, मध्याचल (दोपहर) सूर्य, और अस्ताचल (अस्त) सूर्य के रूप में विद्यमान है।

सूर्य भगवान सात घोड़ों द्वारा चलाए जा रहे रथ पर सवार होते हैं। पौराणिक तथ्यों के अनुसार सूर्य भगवान जिस रथ पर सवार हैं उसे अरुण देव द्वारा चलाया जाता है। एक ओर अरुण देव द्वारा रथ की कमान तो संभाली ही जाती है लेकिन रथ चलाते हुए भी वे सूर्य देव की ओर मुख कर के ही बैठते हैं। सूर्य भगवान जिन्हें आदित्य, भानु और रवि भी कहा जाता है, वे सात विशाल एवं मजबूत घोड़ों पर सवार होते हैं। इन घोड़ों की लगाम अरुण देव के हाथ होती है और स्वयं सूर्य देवता पीछे रथ पर विराजमान होते हैं। सूर्य भगवान के रथ को संभालने वाले सात घोड़ों के नाम हैं - गायत्री, भ्राति, उस्निक, जगति, त्रिस्तप, अनुस्तप और पंक्ति


सूर्य पुराण में भी है इस मंदिर की कहानी
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सूर्य पुराण के अनुसार ऎल एक राजा थे, जो किसी ऋषि के शापवश श्वेत कुष्ठ रोग से पीडित थे। वे एक बार शिकार करने देव के वनप्रांत  ( नोट : अभी भी यह इलाका वन प्रदेश का भाग है , जहां आसपास के पहाडों में बोदला , धन्श्री, चिल्ह्की, बाण गौरेया , बेढनी  प्रमुख है ) में पहुंचने के बाद राह भटक गए।


राह भटकते भूखे-प्यासे राजा को एक छोटा सा सरोवर दिखाई पडा जिसके किनारे वे पानी पीने गए और अंजुरी में भरकर पानी पिया। पानी पीने के क्रम में वे यह देखकर घोर आश्चर्य में पड़ गए कि उनके शरीर के जिन जगहों पर पानी का स्पर्श हुआ उन जगहों के श्वेत कुष्ठ के दाग जाते रहे। इससे अति प्रसन्न और आश्चर्यचकित राजा अपने वस्त्रों की परवाह नहीं करते हुए सरोवर के गंदे पानी में लेट गए और इससे उनका श्वेत कुष्ठ रोग पूरी तरह जाता रहा। शरीर में आश्चर्यजनक परिवर्तन देख प्रसन्नचित राजा ऎल ने इसी वन में रात्रि विश्राम करने का निर्णय लिया। रात्रि में राजा को स्वप्न आया कि उसी सरोवर में भगवान भास्कर की प्रतिमा दबी पड़ी है। प्रतिमा को निकालकर वहीं मंदिर
बनवाने और उसमे प्रतिष्ठित करने का निर्देश उन्हें स्वप्न में प्राप्त हुआ। कहा जाता है कि राजा ऎल ने इसी निर्देश के मुताबिक सरोवर से दबी मूर्ति को निकालकर मंदिर में स्थापित कराने का काम किया और सूर्य कुंड का निर्माण कराया लेकिन मंदिर यथावत रहने के बावजूद उस मूर्ति का आज तक पता नहीं है। जो अभी वर्तमान मूर्ति है वह प्राचीन अवश्य है, लेकिन ऎसा लगता है मानो बाद में स्थापित की गई हो। 


कहते हैं कि अपने अस्तित्व को बचाने के लिए यह मंदिर औरंगजेब के समय अपना  मुख रातों रात पूर्व से पश्चिम में बदल लिया था . तब से ही इस मंदिर का प्रवेश द्वार पश्चिम की तरफ से है . भारत या दुनिया में एकमात्र देव का सूर्य मंदिर ही है जिसका प्रवेश द्वार पश्चिम की तरफ से है.

मंदिर में अजीब तरह की शांति और सुकून की अनुभूति होती है . लोग यहाँ पर अपनी मन्नते मांगने आते है . मंदिर के कुछ दूर पर ही  सूर्य कुंड तालाब है। लोग मंदिर में पूजा करने से पहले इसी तालाब में स्नान करते हैं . छठ पूजा के समय देव नगरी की रौनक ही कुछ और होती है . छठ पूजा मनाने के लिए देव से उपयुक्त स्थान कोई और नहीं है .