देवकुण्ड महोत्सव का होगा आयोजन, बैठक 19 जून को


 


औरंगाबाद। बिहार के औरंगाबाद जिला में देव ,देवकुंड, उमगा , गजना , सतबहिनी आदि प्रमुख धार्मिक एवं ऐतिहासिक जगहें हैं । यहां उक्त सभी जगहों का न तो अपेक्षित विकास ही हुआ है और न तो अपेक्षित महत्व ही । पर, संतोष की बात है कि देव , उमगा , गजना तथा सतबहिनी (अंबा) के स्थानीय लोगों के सहयोग से उक्त जगहों के विकास एवं ऐतिहासिक गरिमा और धार्मिक महिमा को देश दुनिया में प्रचारित - प्रसारित करने हेतु महोत्सव का आयोजन किये जा रहे हैं । अब तकरीबन सभी महोत्सव को सरकारी अनुदान मिलने लगे हैं । अब तक देवकुंड इससे बंचित था। बिदित हो कि टंडवा के लोगों ने पुनपुन महोत्सव आयोजित करने का निर्णय लिया है ।

सिध्देश्वर विद्यार्थी ने बताया कि बहुत खुशी की बात है की गोह -हसपुरा के लोगों ने भी देवकुंड के अपेक्षित विकास और इसके धार्मिक गरिमा एवं ऐतिहासिक गरिमा को उचित महत्व दिलाने हेतु देवकुंड महोत्सव आयोजित करने का मन बना लिया है ।
उन्होंने बताया कि देवकुंड महोत्सव -2019 के आयोजन पर बिचार- बिमर्श हेतू दिनांक 19 .6 .2019 को 11 बजे देवकुंड मठ पर एक बैठक बुलाई गयी है। इस बैठक में स्थानीय विधायक, सांसद के साथ साथ औरंगाबाद, अरवल ,जहानाबाद के सभी पंचायत प्रतिनिधि , समाजिक कार्यकर्ता , राजनीतिक कार्यकर्ता ,जागरूक जनता, बुद्धिजीवियों, पत्रकाररों को देवकुंड मठ मे आमंत्रित किया गया है।
अति प्राचीन तीर्थ है देवकुंड धाम
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महर्षि च्यवन की तपोभूमि देवकुंड में कुण्ड की अग्नि पांच सौ वर्ष से अधिक समय से प्रज्ज्वलित है।
अरवल और औरंगाबाद की सीमा पर स्थित देवकुंड वह धरती है जहां भगवान श्री राम गया में अपने पितरों को श्राद्ध व पिण्डदान करने से पूर्व ही भगवान शिव की स्थापना कर पूजा अर्चना की थी। बाद में महर्षि च्यवन ने उसी स्थल को अपनी तपोभूमि बनाया और वर्षों तक तपस्या की। पांच सौ वर्ष पूर्व बाबा बालपुरी ने च्यवन ऋषि के उसी आश्रम में साधना की और हवन करने के बाद जिन्दा समाधी ले ली। तब से उस कुण्ड की अग्नि आज तक प्रज्ज्वलित है।


ऐसा भी नहीं कि उस कुण्ड में प्रतिदिन हवन होता है। इक्के-दुक्के आने-जाने वाले लोग ही उस कुण्ड में धूप डालते हैं या फिर किसी विशेष अवसर पर वहां हवन आयोजित होता है, किन्तु कुण्ड की अग्नि पांच सौ वर्षों से कभी नहीं बुझी। ऊपर से देखने पर कुण्ड राख का ढेर लगता है, किन्तु राख में थोड़ा सा भी हाथ डालने पर उसके नीचे अग्नि का एहसास होता है। कुण्ड में धूप डाल कर पास रखे छड़ से जैसे ही राख को उड़ेला जाता है उसकी अग्नि धूप को पकड़ लेती है और कुण्ड से धूंआ निकलना शुरू हो जाता है।
कुण्ड के बगल में ही महर्षि च्यवन की प्रतिमा स्थापित है और बगल में बाबा बालदेव का वह आसन रखा है जिस पर बैठकर उन्होंने साधना की थी। कुण्ड के सामने बाबा बालपुरी की समधी स्थल पर छोटे-छोटे दस शिवलिंग स्थापित हैं।


बाबा दुधेश्वरनाथ के नाम से प्रसिद्ध भगवान शिव का मंदिर कुण्ड से कुछ दूरी पर सहस्त्रधारी (तालाब) के किनारे है जहां पहले भगवान श्री राम और बाद में च्यवन ऋषि ने पूजा अर्चना की थी।
बताते हैं कि महर्षि च्यवन जब यहां तपस्या में लीन थे तो उस समय वहां के राजा शरमाती और उनकी पुत्री सुकन्या जंगल में भ्रमण के लिए आए थे। सुकन्या एक टीले के बीच चमकती रोशनी देखकर उसमें कुश डाल दी। दरअसल वह तपस्या में लीन महर्षि च्यवन थे जिनकी आंखे सुकन्या के कुश डाले जाने के कारण फूट गई। महर्षि के श्राप से बचने के लिए राजा ने सुकन्या से महर्षि चवन की शादी कर दी। वृद्ध महर्षि च्यवन से नवयौवन सुकन्या की विवाह के बाद अश्विनी कुमारों ने यज्ञ कर महर्षि च्यवन को उसी सहस्त्रधारा में स्नान कराया और विशेष रसायन तथा सोमरस का पान कराया जिसके बाद महर्षि च्यवन को यौवन प्राप्त हुआ। वही रसायन बाद में च्यवनप्राश के नाम से प्रसिद्ध हुआ। आज भी यहां सावन के महीने में लोग दूर -दूर से भगवान शिव के दर्शन करने आते हैं और हवन कुण्ड में धूप अर्पित करते हैं। सहस्त्रधारा में बड़े पैमाने पर छठ पर्व आयोजित किया जाता है।