जीडीपी में गिरावट दर गिरावट, कठघरे में सरकार
 

नई दिल्ली। मजबूत जनादेश हासिल कर केंद्र में सत्ता में आई भाजपा नीत राजग सरकार के सामने सकल घरेलू उत्पाद और बेरोजगारी के ताजा आंकड़ों ने सवाल खड़े कर दिए हैं। सरकार के सामने बड़ा सवाल यह है कि आखिर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में गिरावट इतनी तेज क्यों रही है। यह अप्रैल 2019 में 8.2 फीसद थी, लेकिन अप्रैल-जून 2019 में गिरकर 6.2 फीसद हो गई। हाल के वर्षों में हमने कुछ तिमाहियों के भीतर जीडीपी में दो फीसद की गिरावट नहीं देखी थी। ताजा आंकड़ों का माजरा क्या है। भारतीय अर्थव्यवस्था पिछले पांच साल में सबसे धीमी रफ्तार से बढ़ी है। सरकार की ओर से जारी किए गए आंकड़ों से यह बात साफ होती है। 2017-18 के दौरान नोटबंदी और जीएसटी के खराब क्रियान्वयन की दोहरी मार झेलने के बाद अर्थशास्त्रियों ने अप्रैल-जून 2018 में उपभोग आधारित हल्की उछाल आने के बाद थोड़ी सी राहत की सांस ली थी, जब जीडीपी बढ़कर 8.2 फीसद हो गई थी।

मौजूदा हाल
पिछले वित्तीय वर्ष अप्रैल 2018 से मार्च 2019 तक आर्थिक वृद्धि दर 6.8 फीसद रही। वहीं जनवरी से मार्च तक की तिमाही में ये दर 5.8 फीसद तक ही रही। यह दर पिछले दो साल में पहली बार चीन की वृद्धि की दर से भी पीछे रह गई है। इसका मतलब है कि भारत अब सबसे तेजी से आगे बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था नहीं रह गया है। सरकार के सामने मौजूदा चुनौती है कि वह अर्थव्यवस्था के प्रति लोगों का यकीन वापस ला सके। सरकार की पहली चुनौती रोजगार होगी।

कृषि और विनिर्माण का असर
आर्थिक विकास दर में गिरावट का अहम कारण कृषि और विनिर्माण क्षेत्रों का खराब प्रदर्शन है। कृषि, वानिकी और मत्स्य क्षेत्रों का जीवीए 2018-19 की चौथी तिमाही में 0.1 फीसद घटा, जबकि 2017-18 की चौथी तिमाही में इसमें 6.5 फीसद की वृद्धि दर्ज की गई थी। इस बार विनिर्माण क्षेत्र में मंदी ज्यादा रही। वहीं, वित्तीय, रीयल एस्टेट और पेशेवर सेवा में सुधार दिखा। इसमें 2018-19 की अंतिम तिमाही में 9.5 फीसद की वृद्धि रही, जो इससे पूर्व वित्त वर्ष की इसी तिमाही में 5.5 फीसद थी।

रोजगार का हाल
मोदी सरकार को उसके पहले कार्यकाल में सबसे ज्यादा रोजगार के मुद्दे पर घेरा गया। सरकार की रिपोर्ट के मुताबिक साल 2017-18 के बीच बेरोजगारी 45 साल में सबसे ज्यादा रही। घटता निर्यात भी रोजगार के रास्ते में बड़ी रुकावट पैदा करता है। अर्थशास्त्री सरकार से ऐसी नीतियों को प्राथमिकता देने की उम्मीद जता रहे हैं, जो छोटे और मध्यम व्यापार को अधिक प्रतिस्पर्द्धी बनाएंगी। केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय के मुताबिक भारत की प्रति व्यक्ति आय मार्च 2019 के आखिर में 10 फीसद बढ़कर 10,534 रुपए महीना यानी एक लाख 26 हजार 406 रुपए सालाना पहुंच जाने का अनुमान है। इससे पूर्व वित्त वर्ष में यह नौ हजार 580 रुपए महीना यानी एक लाख 14 हजार 958 रुपए सालाना था।

उपभोक्ताओं की मांग
नई जीडीपी दर से साफ है कि भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से नीचे की ओर गिर रही है। चीन के अलग भारत की आर्थिक वृद्धि का सबसे बड़ा कारक यहां की घरेलू खपत है। पिछले 15 साल से घरेलू खपत ही अर्थव्यवस्था को बढ़ाने में सबसे अहम भूमिका निभाता रहा है। उपभोक्ताओं की खरीदने की क्षमता में कमी आई है। कारों-एसयूवी की बिक्री पिछले सात साल के सबसे निचले पायदान पर पहुंच गई है। ट्रैक्टर, मोटरसाइकिल, स्कूटर की बिक्री में भी कमी हुई है।

किसानों का हाल
भाजपा ने अपनी पहली सरकार में चुनिंदा किसानों को 6000 रुपए सालाना देने का फैसला किया था। सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल की पहली मंत्रिमंडल की बैठक में सभी किसानों के लिए ये स्कीम लागू कर दी है। जानकारों की राय में इस योजना से कुछ वक्त के लिए राहत मिलेगी, लेकिन लंबे वक्त में यह काम नहीं आएगी। कृषि क्षेत्र की संरचना को सुधारने की जरूरत बताई जा रही है।

लंबे समय तक चलने वाले चुनाव अर्थव्यवस्था की गति को कम कर देते हैं। बीते दो महीनों में सार्वजनिक कार्यों के लिए टेंडर तक निकालने के लिए सरकार को चुनाव आयोग की मंजूरी लेनी पड़ी। यह अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा नहीं रहा।
– अमिताभ कांत, नीति आयोग के सीईओ।

आर्थिक वृद्धि दर में गिरावट एनबीएफसी क्षेत्र में दबाव जैसे अस्थाई कारकों की वजह से आई है। चालू वित्त वर्ष की अप्रैल-जून तिमाही में आर्थिक विकास दर धीमी रह सकती है, लेकिन इसके बाद इसमें तेजी आएगी।
– सुभाष चंद्र गर्ग, आर्थिक मामलों के सचिव।