प्रकृति पूजक देश में पर्यावरण पर गंभीर ख़तरा

 

भारत जैसे प्रकृति पूजक देश में पर्यावरण पर गंभीर संकट खड़े हैं और इनसे निपटने में वृक्षारोपण एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। जाहिर है, इसका समाधान प्रदूषण कम करने के साथ ज्यादा से ज्यादा मात्रा में पेड़ लगाने में है। अमूमन होता यह है कि सरकारें या स्वयंसेवी संस्थाएं जोरशोर से बड़े पैमाने पर पौधारोपण तो करती हैं, लेकिन परिणाम लगभग शून्य ही आता है।

पिछले 10-15 वर्षों में यदि ये आयोजन पेड़ों से लगाव पैदा कर नैतिक जिम्मेदारी से किए जाते तो शायद घटती हरियाली का संकट इतना गंभीर नहीं होता। अब ज्यादातर ये आयोजन एक वार्षिक त्योहार की भांति हो गए हैं, जो अपने लोगों को आमंत्रित करने और दूसरे दिन फोटो प्रकाशित होने तक सीमित हो गए हैं। हमारी सभ्यता और संस्कृति में पेड़ों का विशेष महत्त्व रहा है और वे देवतुल्य माने गए हैं। इतिहास में जाकर देखें तो हमें कई ऐसे उदाहरण मिलते हैं, जहां पौधारोपण का कार्य बहुत हर्षोल्लास और जिम्मेदारी से किया जाता था।


अस्पतालों का इलाज
जब भी हम भारत में स्वास्थ्य सेवाओं की चर्चा करते हैं तो अक्सर कई प्रकार के आंकड़ों के साथ मरीजों के समांतर डॉक्टरों और अस्पतालों की कमी का हवाला देते हैं। ऐसे आंकड़ों में अस्पतालों का यांत्रिक अमानवीय व्यवहार ढक जाता है और पूरा ध्यान संसाधनों की कमी पर आ जाता है। संसाधनों की समस्या अपने आप में काफी बड़ी है लेकिन मरीजों के प्रति उपेक्षा का भाव ऐसी समस्या है, जिसे लेकर कभी कहीं भी कुछ नहीं किया जाता। मरीज को यह उपेक्षा पूरे चिकित्सा तंत्र से मिलती है। पूरे चिकित्सा तंत्र का अर्थ है किसी अस्पताल के द्वार पर खड़े सिक्योरिटी गार्ड से लेकर पर्ची बनाने वाले और डॉक्टर का 'अपॉइंटमेंट' देने वाले, सभी में उपेक्षा का भाव दिखता है।

केवल डॉक्टर अकेला ढांचे को नहीं चलाता। डॉक्टरों के अंदर तो हमदर्दी का भाव होना ही चाहिए। लेकिन जब तक उन्हें सहयोग देने वालों और अन्य कर्मचारियों के अंदर माननीय भाव पैदा नहीं होगा, डॉक्टर चाहे भी तो स्थिति नहीं बदल सकते। मरीज या उसके साथ गए रिश्तेदारों को प्रवेश के साथ ही यह लगना चाहिए कि पूरे अस्पताल की उनके साथ सहानुभूति है और उनका पूरा सहयोग मिल रहा है। हमारे समाज की कई त्रासदियां ऐसी हैं, जो हमदर्दी के अभाव के कारण ही पैदा होती हैं। पर यह स्थिति बदलेगी कैसे? इसके कई तरीके हो सकते हैं। मसलन, स्वास्थ्य महकमे से जुड़े हर व्यक्ति की नियुक्ति के पूर्व प्रशिक्षण की ऐसी व्यवस्था की जा सकती है, जिसमें अस्पताल आने वाले व्यक्ति के बारे में उनकी सोच कैसी हो और उसके प्रति उनका व्यवहार कैसा हो आदि का ज्ञान हो जाए। ऐसा प्रशिक्षण अनिवार्य किया जाना चाहिए। समय-समय पर 'रिफ्रेशर कोर्स' भी चलते रहने चाहिए। इससे पूरी स्थिति एकदम से बदल जाएगी ऐसा नहीं है, लेकिन एक बड़ा सुधार अवश्य होगा।