स्नेहा कुमारी चौरसिया की फांसी लगाकर मौत या हत्या की अलग कहानी ?





 


नई दिल्ली।  बिहार के सीवान जिले में तैनात कांस्टेबल स्नेहा कुमारी चौरसिया की फांसी लगाकर आत्महत्या करने के मामले में  कई मोड़ व अनसुलझी पहलू है। उल्लेखनीय है कि गत 1 जून को वह सरकारी क्वार्टर्स में मृत पाई गई थी, लेकिन जिस स्थिति में उसकी लाश पड़ी हुई थी, उससे देखकर अंदाजा लगाया जा सकता था कि उसकी मौत 48 घंटे पहले यानी 30 मई को हुई होगी।


अपने फेसबुक पर स्टेटस पर 'मरने वाले तो एक दिन बिना बताए मर जाते हैं, रोज तो वो मरते हैं, जो खुद से ज्यादा किसी को चाहते हैं' लिखने वाली स्नेहा कुमारी अब इस दुनिया में नहीं है। यह बात सोचने वाली है कि स्नेहा कुमारी कोई आम लड़की या कॉलेज स्टूडेंट नहीं, बल्कि बिहार पुलिस में बतौर कांस्टेबल पद पर तैनात थी। परंतु स्नेहा कुमारी की मौत के दो दिन बाद पुलिस विभाग को इसका पता चला।


उधर, पिता विवेकानंद मंडल चौरसिया का कहना है कि उनकी बेटी की जान उसकी सुंदरता ने ले ली.एक बेबस पिता का यह बयान अपने आप में सब कुछ बयां कर रहा है। मृत महिला कांस्टेबल के परिवार वालों द्वारा लगाए जा रहे आरोपों को देखकर इस मामले में पुलिस की भूमिका पर भी शक पैदा होता है। परिजनों ने स्नेहा की आत्महत्या नहीं बल्कि हत्या बता रहे हैं।


स्नेहा की पोस्टमार्टम रिपोर्ट अभी तक नहीं आई है, लेकिन यह कहना गलत नहीं है कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट से इस मामले में और बड़े खुलासे जरूर हो सकते हैं। इस पूरे मामले में पुलिस की भूमिका संदिग्ध है।


हैरान कर देने वाली बात यह है कि स्नेह जिस बिहार पुलिस का हिस्सा थी, वही पुलिस इस पूरे मामले को संदिग्ध बना रही है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजमी है कि आखिर पुलिस ने किसे बचाने के लिए स्नेहा कुमारी की मौत को आत्महत्या करार दिया है। इस मामले में पुलिस की भूमिका पर लगातार शक बढ़ता जा रहा है।


स्नेहा की मौत के बाद पुलिस द्वारा स्नेहा की तबीयत खराब होने का हवाला देते हुए उसके पिता को तुरंत सीवान बुलाया गया।  पिता के मुंगेर से सीवान पहुंचने के बाद उन्हें बताया गया कि स्नेहा को पटना भेज दिया गया। इसके बाद दो पुलिसकर्मी पिता को लेकर पटना के लिए निकल गए, लेकिन उन्हें पटना नहीं, बल्कि उल्टा मुंगेर पहुंचा दिया गया।


उधर, स्नेहा की डेड बॉड़ी सढ़ने के कारण सीवन के डाक्टरों के पोस्टमार्टम करने से इनकार करने पर पुलिस ने डॉक्टर के साथ मारपीट की, तो वहां के सभी डॉक्टर मारपीट के विरोध में हड़ताल पर चले गए। बाद में पोस्टमार्टम के लिए स्नेहा की बॉडी को पीएमसीएच पटना भेज दिया गया। स्नेहा की मौत के मामले में नया मोड़ तब आया जब डेड बॉड़ी को स्नेहा के पैतृक गांव मुंगेर ले जाया गया। परिवार वालों ने शव को पहचानने से इनकार कर दिया और जमकर हंगामा करते हुए हाईवे जाम कर दिया।


इसपर पुलिस ने सख्ती से पेश आते हुए स्नेहा के परिवार के 10 सदस्यों को हिरासत में लेकर बाद में जबरन डेड बॉड़ी का दाह संस्कार कर दिया। यहां तक पुलिस खुद शव को श्मशानघाट तक लेकर पहुंची। स्नेहा के परिवार वालों ने स्नेहा के साथ दुष्कर्म का भी आरोप लगाया है।


यह संभव हो सकता है कि इस पूरे मामले में पुलिस विभाग का ही कोई ताकतवार है, जिसे बचाने के लिए सीवान और मुंगेर दोनों जगहों की पुलिस लगी है।


आखिर इतना वक्त क्यों लगा पुलिस को शव सौपने में? ये पुलिस की लापरवाही नहीं तो और क्या है। सीवान के एसपी नवीन झा का कहना है कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही परिजनों के आरोपों पर कुछ कहा जा सकता है। वहीं मुंगेर के एसपी का कहना है कि स्नेहा के शव नहीं होने की बात सामने आई है, इसलिए उसका बॉडी सैंपल लेकर डीएनए टेस्ट के लिए भेजा गया है।


बहरहाल, स्नेहा की मौत को पुलिस दबाने की पूरी ताकत लगा रखी है। उधर, जनहित किसान पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्यामसुंदर दास चौरसिया स्नेहा प्रकरण की पूरी ईमानदारी से जांच करने की मांग की है। अन्यथा वे एक बड़े आंदोलन करने की घोषणा की है।