कल्कि अवतार बनाम धर्म का चोख धंधा शुरू



पुराणों में कल्कि अवतार के कलियुग के अंतिम चरण में आने की भविष्यवाणी की गई है। अभी कलियुग का प्रथम चरण ही चल रहा है लेकिन अभी से ही कल्कि अवतार के नाम पर पूजा-पाठ और कर्मकांड शुरू हो चुके हैं। कुछ संगठनों का दावा है कि कल्कि अवतार के प्रकट होने का समय नजदीक आ गया है और कुछ का दावा है कि कल्कि अवतार हो चुका है। दोनों ही तरह के लोग भ्रमित इसलिए हैं क्योंकि वे सभी अवैदिक हैं।
 हाल ही में इंश्योरेंस क्लर्क से कथित 'कल्कि भगवान' बने विजय कुमार नायडू के यहां जब इनकम टैक्स का शिकंजा कसा गया तो वह रफूचक्कर हो गया। सोचिए भगवान भी डरकर रफूचक्कर हो सकते हैं? देशभर में इस समय कई 'कल्कि भगवान' सक्रिय हैं जिनके कई आश्रम लोगों को लूटने का केंद्र बने हुए हैं।



इसके अलावा देशभर में कल्कि के नाम पर कई मंदिर बन गए हैं। ऐसा ही एक मंदिर उत्तरप्रदेश में संभल ग्राम में बना है, जो धार्मिक धंधे का नया केंद्र है। ये लोग कल्कि के नाम पर दिल्ली आदि क्षेत्रों में ऑडियो, वीडियो, सीडी, पुस्तक आदि साहित्य सामग्री का विकास कर प्रचार-प्रसार करते हैं। इन्होंने कल्कि के नाम पर आरती, चालीसा, पुराण आदि सब बना लिए हैं।

इसी मंदिर के उत्तर प्रदेश में सक्रिय कल्कि वाटिका नामक संगठन का दावा है कि कल्कि अवतार के प्रकट होने का समय नजदीक आ गया है। इन लोगों का मानना है कि देवी जगत में कल्कि अवतार हो गया है। स्वप्न, जागृत और वाणी अनुभवों द्वारा वे भक्तों को संदेश दे रहे हैं। उनकी महाशक्तियां भक्तों की रक्षा के लिए इस जगत में चारों ओर फैल चुकी हैं, अब बस उनका केवल प्राकट्य शेष है। इसका तार्किक आधार यह है कि अवतार किसी समयसीमा में बंधा नहीं होता। उसके प्राकट्य के अपने मापदंड होते हैं।...कहते हैं कि देश में उल्लू जब तक जिंदा है तब तक दूसरे पक्षी उसकी पीठ पर बैठकर आराम से जिंदगी की उड़ान भरा करेंगे।

भगवान कल्कि की पूजा का प्रचलन लगभग पौने तीन सौ साल से जारी है। पुराणों में वर्णित कथा के आधार पर कल्कि भगवान के एक मंदिर का निर्माण राजा सवाई जय सिंह ने जयपुर में 1739 ईस्वी में करवाया था। यह मंदिर उन्होंने अपने महल के पास ही बनवाया था, जो दक्षिणायन शिखर शैली में बना था।

इस तरह धीरे-धीरे संपूर्ण देश में अब कल्कि के नाम पर लूट प्रारंभ हो चुकी है। इस लूट का एकमात्र कारण यह है कि अधिकतर हिन्दू जनता अपने धर्म को नहीं जानती है। ऐसे में स्वाभाविक है कि वह गुरु, बाबा और कथित भगवानों ने चरण पखारती रहती है। इस जनता ने अपनी जिंदगी में कभी गीता का अध्ययन नहीं किया और वेदों को तो देखा तक नहीं है। बस कथावाचकों से पुराणों की कहानियां ही सुनते रहे हैं।

हिन्दू संत बनना बहुत कठिन है, क्योंकि संत संप्रदाय में दीक्षित होने के लिए कई तरह के ध्यान, तप और योग की क्रियाओं से व्यक्ति को गुजरना होता है तब ही उसे शैव, शाक्त या वैष्णव साधु-संत मत में प्रवेश मिलता है। इस कठिनाई, अकर्मण्यता और व्यापारवाद के चलते ही कई लोग स्वयंभू साधु और संत कुकुरमुत्तों की तरह पैदा हो चले हैं। इन्हीं नकली साधु्ओं के कारण हिन्दू समाज लगातार बदनाम और भ्रमित भी होता रहा है। लोग ऐसे तथाकथित संतों से दीक्षा लेकर उन्हें अपना गुरु मानते हैं। ये ऐसे गुरु घंटाल हैं कि लोगों को देते कुछ नहीं बल्कि लोगों के पास जो है उसे भी छीन लेते हैं।

हेरा-फेरी के दौर में कोई कैसे किसी भी संत पर विश्वास करके उसका परम भक्त बन जाता है, यह आश्चर्य का ही विषय है। ऐसा नहीं है कि अनपढ़ या गरीब लोग ही इन तथाकथित संतों के भक्त बनकर इनके चरणों में साष्‍टांग पड़े रहते हैं, बल्कि बहुत ज्यादा पढ़े-लिखे लोग भी इनके आगे गिड़गिड़ाते नजर आते हैं।

इसमें लोगों का दोष नहीं, दरअसल व्यक्ति अपने कर्मों से इतना दुखी हो चला है कि उसे समझ में नहीं आता कि किधर जाएं, जहां उसका दुख-दर्द मिट जाए। व्यक्ति धर्म के मार्ग से भटक गया है तभी तो ठग लोग बाजार में उतर आए हैं और लोगों के दुख-दर्द का शोषण कर रहे हैं। यह सिर्फ हिन्दू धर्म की विडंबना नहीं है, सभी धर्मों में कुछ ऐसे तत्व पाए जाते हैं, जिन्होंने धर्म को धंधा बनाकर रख दिया है। वे भोली-भाली जनता को परमेश्वर, प्रलय, ग्रह-नक्षत्र और शैतान से डराकर लुटते हैं।



इन तथाकथित धर्म के ठेकेदारों के पहवाने और व्यवहार को देखकर दुख होता है कि इन्होंने धर्म का सत्यानाश कर दिया है। कोई इन्हें रोकने वाला नहीं है, क्योंकि हम लोकतंत्र में जी रहे हैं। इनकी अजीब तरह की हरकतों को देखकर लगता है कि कौन विश्वास करेगा धर्म पर? ये फूहड़ तरीके से नाचते हैं, अजीब तरीके के वस्त्र पहनते हैं।