गरीब बच्चों को निःशुल्क शिक्षा दे रहे गोरख चौरसिया बन गए हैं उनके भाग्य-विधाता

निःशुल्क शिक्षा की अलख जगा रहे गोरख चौरसिया बन गए हैं गरीब बच्चों का भाग्य-विधाता
👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌



" चलते रहे कदम तो किनारा जरूर मिलेगा, 
अंधकार से लड़ते रहे  तो सवेरा जरूर मिलेगा, 
जब ठान लिया है मंजिल पर जाने को 
तो रास्ता जरूर मिलेगा। "


जब इरादे बुलंद हो तो मंजिल पर तूफ़ान बनकर पहुंचना आसान हो जाता है। 


हम बात कर रहे हैं चौरसिया समाज के एक ऐसे शख्स की जिन्होंने दिव्यांग होते हुए भी उन गरीब बच्चों के लिए भाग्य-विधाता बन गए हैं जो अपने अंधकार की दुनिया को प्रकाश की चिराग़ से शिक्षा के क्षेत्र में अपने सपने को पूरा करना चाहते हैं। वे शिक्षा भी निःशुल्क दे रहे हैं, वह भी बिना लालच, तामझाम व किसी ड्रामा के बगैर, वह भी पिछले 15 वर्षों से। उनके छात्र देश के कई संस्थाओं में उच्च पदों पर काबिज हैं और गरीबी से उपर उठकर अपना नाम रौशन कर रहे हैं।
जैसा कि आप जानते हैं कि चौरसिया समाज में अनेक संगठन बने हुए हैं और इसके पदाधिकारी सामाजिक कार्यों की जगह ड्रामा और अपने आप को शोखियां बघारने में लगे रहते हैं और अपने-अपने ग्रुपों के सदस्यों को जिनका कोई बड़ी उपलब्धियां नहीं होती, उन्हें भी
 " चौरसिया रत्न " का तमगा समारोह आयोजित कर तथा तालियां बजवाकर सौंप देते हैं। विडम्बना ही है कि कई दशकों से समाज का मसीहा बनने के ढोंग में वे समाज को आईना दिखाने की जगह भ्रमित कर रहे हैं। साथ ही समाज के गरीब कन्याओं की शादी-व्याह की दुनिया तक अटक कर रह गए हैं। ये नहीं चाहते कि कोई प्रतिभा उनकी जगह ले ले। अगर कोई बढ़ने लगता है तो वे टांग खिंचाई करने लगते हैं। वे संगठन के प्रभुत्व को अपने तक ही सीमित रखना चाहते हैं और सीमित भी कर रखे हैं।
वहीं,  गोरख चौरसिया इन सबसे दूर गरीब बच्चों के भविष्य संवारने में जुटे हुए हैं।
उ. प्र के संतकबीरनगर के खलीलाबाद विकास खंड के बेलवानिया निवासी गोरख चौरसिया बेहद गरीब हैं, पर उनका दिल अमीर है। उन्होंने अपने घर को ही शिक्षा का मंदिर बना रखा है। वे कल्पा देवी रामफेर कोचिंग सेंटर के माध्यम से बच्चों का भविष्य गढ़ रहे हैं। आज उनके संस्थान में तकरीबन 100 बच्चे निःशुल्क शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। साथ ही वे अति गरीब बच्चों को संसाधन भी उपलब्ध कराते हैं।
एक दुर्घटना में उनके सिर में गंभीर चोट लगी थी और उनका एक हाथ और पैर बेकार हो गया था। इससे उन्हें अपनी पढ़ाई छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा। वे हाथ से लिख नहीं सकते थे इसलिए वे अपने क्लास में फेल हो गए। पर,  वे अपने जज़्बे को जिंदा रखा और बाद में दो विषयों से परास्नातक की डिग्री हासिल कर ली। अपनी इस कामयाबी पर उन्होंने ठान लिया की वे गरीब बच्चों के लिए कुछ करेंगे। फलतः आज वे गांव के बच्चों को निःशुल्क शिक्षा देकर उनके भविष्य को संवार रहे हैं।


अविवाहित गोरख चौरसिया भले ही अपने को आईएएस बनने के सपने को साकार नहीं कर सके, पर यह कीर्तिमान अपने छात्रों के माध्यम से रचने को बेताब हैं।
उनके एक छात्र हिमांशु प्रजापति एचआर पीजी कॉलेज में टॉपर रहे हैं। वे कहते हैं कि अपने गुरु गोरख चौरसिया के सानिध्य में पढ़ाई कर ही वे यह कीर्तिमान रचने में कामयाब हुए। उनका लक्ष्य भी यही है कि उनके शरीर में जबतक तक जान है, कोई गरीब बच्चा अशिक्षित न रह जाए।
हमें गर्व है चौरसिया समाज के ऐसे प्रतिभा पर। दरअसल, असली चौरसिया रत्न पाने के ये ही वाज़िब हकदार हैं, चाहे चौरसिया समाज की कोई संस्था दे या न दे।