महाराष्ट्र ने दिखाया राजनीति का नया रूप


नई दिल्ली। यदि आम भाजपा कार्यकर्ता से बीते छह वर्षों के दौरान आपने बात किया होगा, तो उसमें से अधिकांश लोगों ने यह कहा होगा कि नरेंद्र मोदी चौंकाते हैं। यदि उन्हीं लोगों की बात पर भरोसा किया जाए, तो महाराष्ट्र में वाकई उन्होंने, क्योंकि भाजपा का इतना बडा निर्णय उनकी सहमति के बगैर नहीं हो सकता, एक बार और चौंकाया है। शिवसेना की सियासी चाहत बेमेल गठबंधन को मूर्त रूप देने की जुगत में था। शनिवार को सटीक और साफ निर्णय की बात कही गई। शिवसेना के नेता उद्धव ठाकरे को मुुख्यमंत्री बनाने पर कांग्रेस और शरद पवार की राकांपा अपनी सहमति दे चुकी थी। मंत्रियों की संख्या पर सहमति बनने की बात हो गई थी। 


लेकिन, शुक्रवार की रात ही इतना बडा सियासी दांव चला जाएगा, इसकी भनक तक सियासी सूरमाओं को नहीं लगा। शरद पवार चित हो गए या कर दिए गए। हालांकि, शरद पवार हर बार अपनी बातों में कई गूढ बातें छिपाते नजर आए। शुक्रवार रात भाजपा पूरी तरह से एक्टिव मोड में रही। दिल्ली से लेकर मुंबई तक एक टीम क्रियाशील रही। भाजपा की ओर से नारायण राणे नेपथ्य में गोटियां सजाते रहे। शरद पवार के भतीजे अजीत पवार अपने विश्वस्त की फौज तैयार करते रहे। जैसे ही बिसात मनमाफिक हुई, राजभवन का रूख किया गया। सूर्योदय से पहले राज्यपाल ने राष्ट्पति शासन हटाने की घोषणा की और चंद मिनट बाद ही देवेंन्द्र फडणवीस महाराष्ट्र के दोबारा मुख्यमंत्री और अजीत पवार नए उप मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ले चुके थे। 
टिवटर पर प्रधानमंत्री का शुभकामना आते ही बधाइयों का तांता लग गया। न्यूज चैनल को नया मसाला मिल चुका था। बहस-मुहाबिसों के लिए वही पुराने चेहरों को जगह दी गई, लेकिन हर बात में बाल की खाल निकालने वालों इन सुजानों को सियासी दांव की भनक तक नहीं थी। हाय रे जानकार। 
हालांकि, मैं बधाई देना चाहूंगा उन चंद पत्रकारों को, जिन्होंने पूरी जिम्मेदारी के साथ स्वीकारा किया इतनी बडी सियासी डील चल रही थी, हमें खबर नहीं थी, यह हमारी चूक है। 
खैर, महाराष्ट्र ने राजनीति का नया रंग दिखाया है। चाचा एक ओर और भतीजा बेहतर दांव खेल गए। हालंाकि, महाराष्ट्र की राजनीति में यह पहली बार नहीं हुआ है। स्वयं शरद पवार ने करीब 40 साल पहले अपने राजनीतिक गुरु को भी यूं ही पटखनी देकर आगे बढे थे। 1978 की एक दोपहर महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री बसंत दादा पाटिल ने अपने युवा उद्योग मंत्री को भोजन पर बुलाया। भोजन के बाद उद्योग मंत्री ने चलते वक्त बसंत दादा पाटिल से कहा था, 'तो दादा, अब मैं चलता हूं...भूल-चूक माफ करना...' बसंत दादा इन शब्दों के अर्थ नहीं समझ पाए..उन्हें लगा कि उनका युवा उद्योग मंत्री बस यूं ही इन शब्दों का इस्तेमाल कर गया। लेकिन शाम होते ही उस दौर की कांग्रेस यू के सत्रह विधायक उस युवा उद्योग मंत्री के साथ टूट गए। युवा उद्योग मंत्री के गुरू उन दिनों विपक्ष में थे। उस दौर की केंद्र की सत्ताधारी जनता पार्टी के तत्कालीन अध्यक्ष चंद्रशेखर ने भी सहयोग किया। अगले दिन अचानक ही 38 साल के मुख्यमंत्री ने राज्य की कमान संभाल ली। वह शख्सियत थे शरद पवार और उनके गुरू थे यशवंत राव चव्हाण।
समय का चक्र देखिए...41 साल बाद शरद पवार को वैसा ही झटका लगा है,जैसा बसंत दादा पाटिल को उन्होंने दिया था। इस बार उनके भतीजे अजीत पवार ने जब शरद पवार को मात दी है, तो उनकी बेटी सुप्रिया सुले का दर्द छलका। शिवसेना का गुस्सा दिखा। जो कि वाजिब है। आखिर शिवसेना ने सच को नकारते हुए हठ किया था मुख्यमंत्री बनाने का। बेमेल लोगों से आप की दोस्ती कहां मुकाम हासिल करती है ? यह बात शिवसेना को अब महसूस हो रही होगी। एक बात और कहना चाहूंगा कि यदि शिवसेना कांग्रेस और राकांपा के साथ सरकार बनाने को लेकर वाकई गंभीर थी तो देरी क्यों हुई ? देरी शरद पवार के कारण हुई या संजय राउत का बडबोलापन था ? कांग्रेस नेतृत्व आखिर कितना गंभीर था शिवसेना के साथ आने के लिए ? क्या कांग्रेस के अहम रणनीतिकार माने जाने वाले अहमद पटेल मुंबई जाकर भी वहां की तासीर नहीं समझ पाए ? सवाल एक नहीं, कई हैं। कुछ लोग राज्यपाल की भूमिका और मंशा को लेकर सवाल उठाएंगे ? क्या उन्हें यह नहीं पता है कि हमारी व्यवस्था में राज्यपाल को किस तरह उपयोग किया जाता है? 
अब क्या होगा ? बीते कुछ दिनों से हर दिन और हर घंटे बदलने वाली सियासी दांव-पेंच अब कितने समय तक और चलेगी ?
हालांकि, मैंने अपने पत्रकारीय जीवन में जितना देखा और समझा है, शरद पवार की राजनीति को समझने की कोशिश की है, उसके आधार पर यह कहने में हर्ज नहीं है कि आने वाले समय में अजीत पवार को शरद पवार को आशीर्वाद मिलता है, तो आश्चर्य मत कीजिएगा। शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले केंद्र सरकार में मंत्री बनती हैं, तो चैंकिएगा नहीं। आखिर, यह सियासत है, जहां सिद्धांत को कुर्सी के लिए तिलांजलि देना पुराना शगल रहा है।