श्रुति परंपरा और आधुनिक राष्ट्रवाद की परिभाषा

समय बीतता गया और श्रुति की परंपरा का लोप होते होते लोग महाभारत जैसे ग्रंथों की पुरानी परिभाषाएं भूलने भी लगे | राष्ट्रवाद की जो आधुनिक परिभाषाएं हैं उनमें से एक अर्नेस्ट रेनन के 1882 के सोरेबोन्न यूनिवर्सिटी में दिए गए लेक्चर से आती है | उन्होंने कहा था, राष्ट्र लम्बे समय के संघर्ष, बलिदानों और भक्ति भाव की परिणिति है |



गर्व से भर देने वाली कथाओं, शौर्य की गाथाओं, और महानायकों का इतिहास ही वो सामाजिक पूँजी है जिसपर एक राष्ट्र की भावना का आधार रखा जाता है | एक राष्ट्र की भावना को समाज में समाहित करने के लिए गौरवशाली इतिहास की जरुरत होती है, अपने महानायक चाहिए | साझा सांस्कृतिक विरासत और भविष्य में, साथ मिलकर, ऐसे ही गौरवशाली कार्यों को अंजाम देने की मंशा ही राष्ट्र को जन्म देती है |
 
एक राष्ट्र के नागरिक होने के लिए ये जरूरी कारण हैं | राष्ट्र के नागरिक इसी एकीकरण की भावना से जुड़े होते हैं | इसलिए किसी राष्ट्र के बारे में जानना है और राष्ट्र की भावना के बारे में जानना है तो उसका एकमात्र तरीका है, जनमत संग्रह | राष्ट्र उसके नागरिक होते हैं, नागरिकों के अलावा कोई भी राष्ट्र का निर्धारण नहीं कर सकता |



 
लगभग सर्वमान्य इस परिभाषा के हिसाब से तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग, भारत की राष्ट्रिय भावना को आहात करने का दोषी है | अपने शब्दों के जाल में भोली भाली जनता को फंसाने की कोशिश के बदले उन्हें बिना शर्त देश से माफ़ी मांगनी चाहिए |


अपनी बात शुरू करने से पहले हम आपको एक प्रसिद्ध कविता की लाइन याद दिला दें, जो रुडयार्ड किपलिंग ने लिखी थी : “East is East and West is West, and never the twain shall meet.” राष्ट्रवाद पर चर्चा शुरू करने से पहले ही ये याद दिला देना जरूरी हो जाता है | भारत को कोई धर्म भारत नहीं बनाता, कोई भाषा भी हमें एक नहीं करती, संस्कृति भी यहाँ अलग अलग है | यही कारण होता है कि जब हम किसी विदेशी चश्में से भारत में राष्ट्रवाद को समझने की कोशिश करते हैं तो कामयाबी मिलने की संभावना कम, बहुत कम हो जाती है | भारत के लिए राष्ट्र की परिभाषा कम से कम महाभारत के काल से तो जरूर है | युधिष्ठिर जब शर शैय्या पर पड़े भीष्म से कुछ सीखने गए थे तो कई अन्य चीज़ों के साथ, भीष्म ने राष्ट्र के बारे में भी बताया था |



कुछ महान क्रांतिकारी राष्ट्रवाद को कपोल कल्पित अवधारण साबित करने में लगे हैं उनके हिसाब से १८५७ से पहले राष्ट्र या राष्ट्रवाद की कोई अवधारणा भारत में नहीं थी


आप में से अधिकतर ने यह पढ़ा भी होगा और सायद मान भी लिया हो जो की पूर्णरूपेन ग़लत है ग़लत ही नहीं क़ायदे से कहा जाए तो प्रपंच है 


इसीलिए मैं इन वामीयो को बुद्धि प्रपंची बुलाता हूँ हालाँकि यह सुनने से इनको तकलीफ़ बहुत है लेकिन अब इससे अच्छा और सौम्य सम्बोधन का अभाव है मेरे पास।



ख़ैर मेन मुद्दे पर आते हैं असल हिंदुत्व की भावना ही राष्ट्रवाद है इसमें कोई संदेह नहीं और राष्ट्र की अवधारणा उतनी ही पुरानी है जितना की सनातन , बल्कि यह कहना उचित होगा की राष्ट्रवाद सनातनी है 


हमारे सबसे पहले ग्रंथ ऋग्वेद में राष्ट्र शब्द मेरे हिसाब से लगभग ८ बार आया है 


ऋग्वेद में ही कहा गया है की 


ते अज्येष्ठा अकनिष्ठास उद्भिदो ऽमध्यमासो महसा वि वाव्र्धुः सुजातासो जनुषा पर्श्निमातरो दिवो मर्या आ नो अछा जिगातन ।।


अर्थात राष्ट्र भक्तों में किसी प्रकार की ज्येष्ठता एवं कनिष्ठता की भावना नहीं होने चाहिए सभी को अपने सदप्रयत्नो  से राष्ट्र की उन्नति के लिए प्रयत्नशील होना चाहिए । सामूहिक हित की भावना से ही सबकी उन्नति संभव है और सभी की उन्नति से ही राष्ट्र की दृढ़ता बढ़ती है | उसकी एकता और अखंडता और मजबूत होती है|



उन्ही वेदों से यह प्रपंच करने वाला बुद्धि पिशाचों का समूह #वसुधेव_कुटुम्बकन और #सर्वे_भवंतु_सूखिन: का तो ज़िक्र अपने फ़ायदे के लिए करता है लेकिन राष्ट्र की अवधारणा को छुपा लेता है 


और देवी सूक्त को यदि वेदों की भाषा में समझा जाए तो सम्पूर्ण राष्ट्र की अवधारण है 


देवी सूक्त ऋग्वेद दसम मंडल के १२५ वें सूक्त को कहा गया है वही से कुछ ऋचा उद्धृत कर स्पष्ट करने की कोशिश करता हूँ 


देवी सूक्त
अहं रुद्रेभिर्वसुभिश्र्चराम्यहमादित्यैरुत विश्र्वदेवैः ।
अहं मित्रावरुणोभा बिभर्म्यहमिन्द्राग्नी अहमश्र्विनोभा ॥ १ ॥


भावार्थ ;ब्रह्मस्वरुपा मैं रुद्र, वसु, आदित्य और विश्र्वदेवताके रुपमें विचरण करती हूँ, अर्थात् मैं ही उन सभी रुपोमें भासमान हो रही हूँ । मैं ही ब्रह्मरुपसे मित्र और वरुण दोनोंको धारण करती हूँ । मैं ही इन्द्र और अग्निका आधार हूँ । मैं ही दोनो अश्विनीकुमारोंका धारण-पोषण करती हूँ ।


अहं सोममाहनसं बिभर्म्यहं त्वष्टारमुत पूषणं भगम् ।
अहं दधामि द्रविणं हविष्मते सुप्राव्ये यजमानाय सुन्वते ॥ २ ॥


मैं ही शत्रुनाशक, कामादि दोष-निवर्तक, परमाल्हाददायी, यज्ञगत सोम, चन्द्रमा, मन अथवा शिवका भरण पोषण करती हूँ । मैं ही त्वष्टा, पूषा और भगको भी धारण करती हूँ । जो यजमान यज्ञमें सोमाभिषवके द्वारा देवताओंको तृप्त करनेके लिये हाथमें हविष्य लेकर हवन करता है, उसे लोक-परलोकमें सुखकारी फल देनेवाली मैं ही हूँ ।


अहं राष्ट्री संगमनी वसूनां चिकितुषी प्रथमा यज्ञियानाम् ।
तां मा देवा व्यदधुः पुरुत्रा भूरिस्थात्रां भूर्यावेशयन्तीम् ॥ ३ ॥


मैं ही राष्ट्री अर्थात् सम्पूर्ण जगत् की ईश्र्वरी हूँ । मैं उपासकोंको उनके अभीष्ट वसु-धन प्राप्त करानेवाली हूँ ।
जिज्ञासुओंके साक्षात् कर्तव्य परब्रह्मको अपनी आत्माके रुपमें मैंने अनुभव कर लिया है । जिनके लिये यज्ञ किये जाते हैं, उनमें मैं सर्वश्रेष्ठ हूँ । सम्पूर्ण प्रपञ्चके रुपमें मैं ही अनेक-सी होकर विराजमान हूँ । सम्पूर्ण प्राणियोंके शरीरमें जीवनरुपमें मैं अपने-आपको ही प्रविष्ट कर रही हूँ । भिन्नभिन्न देश, काल, वस्तु और व्यक्तियोंमें जो कुछ हो रहा है, किया जा रहा है, वह सब मुझमें मेरे लिये ही किया जा रहा है । सम्पूर्ण विश्वके रुपमें अवस्थित होनेके कारण जो कोई जो कुछ भी करता है, वह सब मैं ही हूँ ।


मया सो अन्नमत्ति यो विपश्यति यः प्राणितियईं श्रृणोत्युक्तम् 
अमन्तवो मां त उप क्षियन्ति श्रुधि श्रुत श्रद्धिवं ते वदामि ॥ ४ ॥


जो कोई भोग भोगता है, वह मुझ भोक्त्रीकी शक्तिसे ही भोगता है । जो देखता है, जो श्र्वासोच्छ्वासरुप व्यापार करता है और जो कही हुई सुनता है, वह भी मुझसे ही है । जो इस प्रकार अन्तर्यामिरुपसे स्थित मुझे नहीं जानते, वे अज्ञानी दीन, हीन, क्षीण हो जाते हैं । मेरे प्यारे सखा ! मेरी बात सुनो-- मैं तुम्हारे लिये उस ब्रह्मात्मक वस्तुका उपदेश करती हूँ, जो श्रद्धा-साधनसे उपलब्ध होती है ।


अहमेव स्वयमिदं वदामि जुष्टं देवेभिरुत मानुषेभिः।
यं कामये तं तमुग्रं कृणोमि तं ब्रह्माणं तमृषिं तं सुमेधाम् ॥ ५ ॥


मैं स्वयं ही ब्रह्मात्मक वस्तुका उपदेश करती हूँ । देवताओं और मनुष्योंने भी इसीका सेवन किया है । मैं स्वयं ब्रह्मा हूँ । मैं जिसकी रक्षा करना चाहती हूँ, उसे सर्वश्रेष्ठ बना देती हूँ, मैं चाहूँ तो उसे सृष्टिकर्ता ब्रह्मा बना दूँ और उसे बृहस्पतिके समान सुमेधा बना दूँ । मैं स्वयं अपने स्वरुप ब्रह्मभिन्न आत्माका गान कर रही हूँ ।


अहं रुद्राय धनुरा तनोमि ब्रह्मद्विषे शरवे हन्तवा उ ।
अहं जनाय समदं कृणोम्यहं द्यावापृथिवी आ विवेश ॥ ६ ॥


मैं ही ब्रह्मज्ञानियोंके द्वेषी हिंसारत त्रिपुरवासी त्रिगुणाभिमानी अहंकारी असुरका वध करनेके लिये संहारकारी रुद्रके धनुषपर ज्या (प्रत्यञ्चा) चढाती हूँ । मैं ही अपने जिज्ञासु स्तोताओंके विरोधी शत्रुओंके साथ संग्राम करके उन्हें पराजित करती हूँ । मैं ही द्युलोक और पृथिवीमें अन्तर्यामिरुपसे प्रविष्ट हूँ ।


अहं सुवे पितरमस्य मूर्धन् मम योनिरप्स्वन्तः समुद्रे ।
ततो वि तिष्ठे भुवनानु विश्वोतामूं द्यां वर्ष्मणोप स्पृशामि ॥ ७ ॥
इस विश्वके शिरोभागपर विराजमान द्युलोक अथवा आदित्यरुप पिताका प्रसव मैं ही करती रहती हूँ । उस कारणमें ही तन्तुओंमें पटके समान आकाशादि सम्पूर्ण कार्य दीख रहा है । दिव्य कारण-वारिरुप समुद्र, जिसमें सम्पूर्ण प्राणियों एवं पदार्थोंका उदय-विलय होता रहता है, वह ब्रह्मचैतन्य ही मेरा निवासस्थान है । यही कारण है कि मैं सम्पूर्ण भूतोंमें अनुप्रविष्ट होकर रहती हूँ और अपने कारणभूत मायात्मक स्वशरीरसे सम्पूर्ण दृश्य कार्यका स्पर्श करती हूँ ।


अहमेव वात इव प्र वाम्यारभमाणा भुवनानि विश्र्वा ।
परो दिवा पर एना पृथिव्यैतावती महिना सं बभूव ॥ ८ ॥ 


 जैसे वायु किसी दूसरेसे प्रेरित न होनेपर भी स्वयं प्रवाहित होता है, उसी प्रकार मैं ही किसी दूसरेके द्वारा प्रेरित और अधिष्ठित न होनेपर भी स्वयं ही कारणरुपसे सम्पूर्ण भूतरुप कार्योंका आरम्भ करती हूँ । मैं आकाशसे भी परे हूँ और इस पृथ्वीसे भी । अभिप्राय यह है कि मैं सम्पूर्ण विकारोंसे परे, असङ्ग, उदासीन, कूटस्थ ब्रह्मचैतन्य हूँ । अपनी महिमासे सम्पूर्ण जगत् के रुपमें मैं ही बरत रही हूँ, रह रही हूँ ।   


॥ इति देवी सूक्त ॥


यहाँ राष्ट्री का उल्लेख राष्ट्र माता के संदर्भ में हैं सम्पूर्ण भरण पोषण की यह व्याख्या यदि राष्ट्र वाद नहीं तो हम उस प्रपंच को राष्ट्र कैसे मान लें जहाँ सिर्फ़ एक भूखंड उसके लोग सेना और दण्डविधान को राष्ट्र कहा जाता है 


अब कुछ मूर्ख यहाँ भी ज्ञान देने आ जाएँगे की यहाँ राष्ट्र जैसा कुछ कहा ही नहीं गया टी सच है जिसे तुम राष्ट्र समझते हो मूर्खों वह मात्र एक इकाई है तुमको तुम्हारा राष्ट्रवाद मुबारक 


उपैतु मां देवसख: कीर्तिश्च मणिना सह।
प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन् कीर्तिमृद्धिं ददातु मे।।
अर्थात् हे देव, हमें देवों के सखा कुबेर, और उनके
मित्र मणिभद्र तथा दक्ष
प्रजापति की कन्या कीर्ति (यश)
उपलब्ध करायें, जिससे हमें और राष्ट्र
को कीर्ति-समृद्धि प्राप्त हो।
ऋग्वेद के परिशिष्ट में प्राप्त श्रीसूक्त का यह सातवाँ मन्त्र है ।
उपैतु मां देवसख : कीर्तिश्च मणिना सह ।
प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन् कीर्तिमृद्धिं ददातु मे ॥
७॥
हे महादेव सखा कुबेर ! मुझे मणि के साथ
कीर्ति भी प्राप्त हो । मैं इस राष्ट्र में
जन्मा हूँ । इसलिए यह मुझे कीर्ति और धन दें ।


प्रस्थला मद्रगान्धारा आरट्टा नामतः खशाः ।
वसातिसिन्धुसौवीरा इति प्रायोऽतिकुत्सिताः॥
--कर्णपर्व ४४
. आरट्टा नाम ते देशा बाह्लीका नाम ते जनाः |
वसातिसिन्धुसौवीरा इति प्रायो विकुत्सिताः ||(पाठान्तर)


धर्म हमारे राष्ट्र के कण-कण में संव्याप्त है इसलिए भारतीय राष्ट्रवाद आध्यात्मिक राष्ट्रीयता के रूप में जाना जाता रहा है। यही  कारण रहा है कि हमारे ऋषियों ने भारत भूमि को माता कहा है। “माता भूमि पुत्रोहं पृथिव्याः” वाला यह राष्ट्र ही है जहाँ ऋषियों ने ब्रह्मज्ञान पाया व ब्रह्मसाक्षात्कार किया। विश्व को परिवार मानने की सुंदर कल्पना भी इसी भूमि से उपजी है।
राष्ट्र का शाब्दिक अर्थ है-रातियों का संगम स्थल। राति शब्द देने का पर्यायवाची है। राष्ट्रभूमि और राष्ट्रजनों की यह संयुक्त इकाई राष्ट्र इसीलिए कही जाती है कि यहाँ राष्ट्रजन अपनी-अपनी देन राष्ट्रभूमि के चरणों में अर्पित करते है।
स्वामी विवेकानंद ने राष्ट्र को व्यष्टि का समष्टि में समर्पण कहते हुए इसकी व्याख्या की है। आध्यात्मिक राष्ट्रीयता के उद्घोषक श्री अरविंद ने कहा है-राष्ट्र हमारी जन्मभूमि है। मनुस्मृति हमारे देश की साँस्कृतिक यात्रा की ओर संकेत करती है। भगवान मनु कहते हैं कि भारतवर्ष रूपी यह पावन अभियान सरस्वती और दृषद्वती नामक दो देवनदियों के मध्य देव विनिर्मित देश ब्रह्मावर्त से आरंभ
हुआ। सरस्वतीदृषद्वत्योर्देवनद्योर्यदन्तरम् ।
तं देवनिर्मितं देशं ब्रह्मावर्तं प्रचक्षते ।।
तस्मिन्देशे  य  आचार:  पारम्पर्यक्रमागत: ।
वर्णानां  सान्तरालानां स सदाचार उच्यते ।।
एतद्देशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मन: ।
स्वं स्वं चरित्रम् शिक्षेरन्पृथिव्यां  सर्वमानवा:  ।।
--मनुस्मृति  १/१३६,१३७,१३९  


 इस प्रकार मनु महाराज द्वारा सदाचार, नैतिकता देवत्व के सम्वर्द्धन प्रचार प्रसार में विश्वास रखने वाली भारतीय संस्कृति को बताया गया है। महाभारत के भीष्म पर्व में भारत की यशोगाथा का वर्णन कुछ इस तरह हुआ है-
अत्रतेकीर्तयिष्यामिवर्षभारतभारतम्।
प्रिययमिंद्रस्यदेवस्यमनोवैंवस्वतस्यच॥
अर्थात् “हे भारत! अब मैं तुम्हें उस भारतवर्ष की कीर्ति सुनाता हूँ, जो देवराज इन्द्र को प्यारा था, जिस भारत को वैवस्वत मनु ने अपना प्रियपात्र बनाया था, भारतीय राष्ट्रवाद की व्याख्या करते हुए विष्णुपुराण में लिखा है-
 उत्तरम् यत् समुद्रस्य हिमाद्रे: चैव दक्षिणम्। वर्षम् तद् भारतम् नाम भारती यत्र संतति:' (२,३,१)।
इस प्रकार हमारे देश का प्राचीन नाम ब्रह्मावर्त  और  भारतवर्ष है ।


*शिवमहापुराण में भारत महिमा का गान*


*उमा संहिता*:
           सनत्कुमार उवाच
वक्ष्येsहं भारतं वर्षं हिमाद्रेश्चैव दक्षिणे।
उत्तरे तु समुद्रस्य भारती यत्र संसृति:||१||


सनत्कुमारजी बोले- अब मैं हिमालय के दक्षिण में स्थित भारतवर्ष का वर्णन करता हूँ, जहाँ समुद्र के उत्तर में भारती सृष्टि है।


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नवयोजनसाहस्रो विस्तारोsस्य महामुने। स्वर्गापवर्गयो: कर्मभूमिरेषा स्मृता बुधै:||२||


नौ सहस्र योजन विस्तार वाली इस भूमि को ज्ञानियों ने कर्मभूमि कहा है क्योंकि यहीं मनुष्य को अच्छे बुरे कर्म का फल और उससे मोक्ष प्राप्त होता है।


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कदाचिल्लभते मर्त्य: सहस्रैर्मुनिसत्तम।अत्र जन्मसहस्राणां मानुष्यं पुण्यसंचयै:||१८||


हे मुनिवर! हजारों जन्मों के पुण्य संचय होने पर जीव यहाँ मनुष्य जन्म पाता है।


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स्वर्गादपवर्गास्पदमार्गभूते धन्यास्तु ते भारतभूमिभागे। गायन्ति देवा: किल गीतकानि भवन्ति भूयः पुरुषा: सुरास्ते||१९||


हे भारतभूमि(माँ) आप धन्यभागी हैं। आप स्वर्ग और अपवर्ग(मोक्ष) का मार्गरूपा हैं। 
देवता आपकी स्तुति किया करते हैं ,इससे वे यहाँ मनुष्य रूप में अवतरित होते हैं।


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अवाप्य मानुष्यमयं कदाचिद्विहृत्य शम्भो: परमात्मरूपे। फलानि सर्वाणि तु कर्मजानि यास्याम्यहं तत्तनुतां हि तस्य||२०||


(वे देवता यहाँ) कभी मानव देह पाकर तथा कभी शिव के परमात्मरूप में विहार करके समस्त कर्मों के फल को प्राप्त करते हैं और ऐसी भावना रखते हैं कि "मैं शिव के चैतन्य देहत्व को प्राप्त होकर मुक्त हो जाउँ।"


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आपस्यन्ति धन्या: खलु ते मनुष्या: सुखैर्युता: कर्मणि सन्निविष्टा:। जनुर्हि येषां खलु भारतेsस्ति ते स्वर्गमोक्षोभयलाभवन्त:||२१||


सुखों से युक्त वे शुभ कर्मों में लगे हुए मनुष्य धन्य हैं जिनका जन्म भारतवर्ष में होता है।क्योंकि वे स्वर्ग(सुख) और अपवर्ग(मोक्ष) के भी भागी होते हैं।


                             ** मूल रचना आनंद कुमार