टुकड़े-टुकड़े गैंग नहीं, देश में अमन के लिए करें शक्ति का इस्तेमाल

टुकड़े-टुकड़े गैंग पर नहीं, देश में अमन के लिए करें शक्ति का इस्तेमाल



जो अशांत मन को शांत करता है, वह शंकर है। शांति के लिए आवश्यकता पड़ने पर तांडव भी करता है, क्योंकि वह अन्याय का समूल विनाश करने वाला होता है, शिव अनिष्ट के अंत करने वाला देवता होता है। यदि देश का इतना ख्याल है और उसे अंत करने का संकल्प हमने लिया है तो देर किस बात की! उठाइए त्रिशूल और अंत कर दीजिए उस अनिष्ट का, जिसके लिए टुकड़े-टुकड़े गैंग शब्द का प्रयोग किया जाता है। 
पता नहीं इस शब्द का पहला प्रयोग किसने किया। निश्चित रूप से उस महान रचनाकार को  भारत का सर्वश्रेष्ठ नागरिक अलंकरण 'भारत-रत्न' से सम्मानित किया जाना चाहिए। अति तो तब हो गई, जब देश के सबसे शक्तिशाली व्यक्ति और गृह मंत्री अमित शाह इस शब्द का प्रयोग करते है और उसे सबक सिखाने का संकल्प लेते हैं। आपके हाथ में उसी जनता ने पूरी ताकत से आप सहित सरकार को पूर्ण बहुमत देकर शक्तिशाली बनाया है, फिर उन्हें कोसने का क्या लाभ! उस टुकड़े-टुकड़े गैंग के प्रत्येक को चिह्नित करिए, फिर सजा के लिए अदालत भेजकर जेल के सीखचों में डाल दीजिए। बस, खेल खत्म और शंकर के रूप में आप स्थापित हो जाएंगे। 
क्या सरकार का काम यही होता है? क्या हमारे संविधान में ऐसा ही करने के लिए बताया गया है? हमारे संविधान निर्माताओं की पूरी टीम में  मूर्धण्य विद्वान थे, जिन्होंने तहस-नहस भारत को एक सूत्र में बंधा और एक नियम-कानून,यहां तक कि अभिव्यक्ति की आजादी का दायरा भी दिया। क्या संविधान निर्माताओं के सदस्य इतने अयोग्य थे? नहीं, कदापि नहीं, क्योंकि उसे पढ़कर तो यही लगता है कि उन्हें नमन करूं, क्योंकि जहां सूर्य की किरणों को पहुंचने में भी परेशानी होती हो, वहां तक के निवासियों को भी उतना ही अधिकार दिया, जितना देश के प्रथम नागरिक राष्ट्रपति को अधिकार हासिल है। 



आखिर क्या हो रहा है अपने भारत में जहां कोई-न-कोई अपनी व्यथा बताता नजर न आता हो। यदि छोटे उद्योगपति हैं तो उनका उद्योग बंदी के कगार पर है या बंद हो चुका है। यदि नौकरीपेशा है तो उसकी नौकरी जा चुकी है अथवा जाने की आशंकाओं से डरा-सहमा है, किसान है तो वह कर्ज में आकंठ डूबा है और आत्महत्या करने पर बाध्य नजर आ रहा है, यदि युवा पढ़ा-लिखा बेरोजगार है, तो नौकरी ढूंढने में अपना समय भुखमरी के कगार पर रहकर गुजर रहा है। इतने बड़े देश में इतनी तरह की समस्याओं से निश्चित रूप से कोई तुरंत दो एक वर्ष में कैसे निकाल सकता, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि हम अपना आपा खोकर देश के शांत नागरिकों को डराने की कोशिश करने लगें। यदि आप शासक हैं तो जनता आपको ही कोसेगी, आपसे ही सवाल पूछेगी और निदान भी सत्तारूढ़ को ही करना पड़ेगा, उसके विश्वास की अंतिम कड़ी सत्तारूढ़ के रूप में आप पर ही है।
फिर वही बात क्यों दुहराई जाती है कि टुकड़े-टुकड़े गैंग और कांग्रेसियों ने देश को बरगलाया है और उसे दंड दिया जाएगा। गृहमंत्री के रूप में आपको सब पता होगा कि किस  कारण से आज देश अशांत है। जगह-जगह देश की आम जनता सड़क पर आ गई है, पुलिस खदेड़ रही है उसे मार रही है, बिल्कुल अशांत इस देश में कोई अपना उद्योग लगाने किस उम्मीद से आएगा? फिर युवाओं को रोजगार कैसे मिलेगा? देश की भुखमरी कैसे दूर होगी? आखिर इस उपद्रवी माहौल में कोई देश कैसे विकास कर सकता है! नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) पास होने पर भाजपा के कार्यकारी अध्यक्ष एवं केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा ने तो यहां तक कह दिया कि सीएए एवं राष्ट्रीय नागरिकता पंजीकरण (एनआरसी), दोनों निश्चित रूप से लागू होगा। जबकि सच यह है कि अभी यह कानून बना ही नहीं है। वाह! यह कैसा पलीता लगाया जा रहा है देश की जनता को। यह ठीक है कि उपरोक्त दोनों कानून के लागू होने से भारतीय नागरिकों को कोई हानि नहीं होने वाली है, लेकिन जनता को आक्रोशित करने वाला बयान देना भी तो सत्तारूढ़ दल के वरिष्ठ नेता को शोभा नहीं देता, क्योंकि श्रीकृष्ण भी पहले नंद की गाय को जंगल में चराया करते थे, लेकिन समय के साथ श्रीकृष्ण द्वारकाधीश हुए और आज भी संसार में उनसे बड़ा नीति-निर्माता दूसरा नहीं हुआ। इसलिए देश को आज जो भी लोग बरगला रहे है, उन्हें सतर्क हो जाना चाहिए। आनेवाला समय रूपी ऊंट किस करवट बैठेगा, यह कोई नहीं जानता। इसलिए आप एक-एक नागरिक की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार हैं, इसलिए अशांत को शांत करिए, उसे भयभीत मत कीजिए, दंड देने की बात मत कीजिए। शांति की अपील करिए, क्योंकि आपके द्वारा बनाया गया कानून यदि सही है तो देश के नागरिक इतने नासमझ नहीं हैं कि अपने हित की बात और देश हित को समझकर शांत न हो जाएं।
(इस विश्लेषण में शिवाजी सामंत की किताब 'युगंधर' से भी कुछ कोड साभार लिए गए हैं)


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