दीपिका पादुकोण, फ़िल्म छपाक और जेएनयू का विवादे जंग

नई दिल्ली। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में हिंसा के शिकार हुए छात्रों से मिलने के लिए अभिनेत्री दीपिका पादुकोण जेएनयू कैंपस पहुंचीं तो इस मामले को लेकर देश में बातों का जंग युद्ध छिड़ गया है। इसके बाद सोशल मीडिया पर दीपिका को लेकर पक्ष और विपक्ष में जमकर वार-पलटवार हो रहे हैं। कुछ लोगों ने इसे लेकर  दीपिका की राजनीति बताया तो कुछ ने उनकी फिल्म प्रमोशन का तरीका कहा है।


दीपिका ने जेएनयू में हुए हमले पर कहा, 'यह देखकर मुझे गर्व होता है कि हम अपनी बात कहने से डर नहीं हैं। यह देखकर खुशी होती है कि लोग सामने आ रहे हैं और बिना किसी खौफ के अपनी आवाज उठा रहे हैं। ' उन्होंने कहा कि यह जरूरी है कि लोग चुप न रहें, खुलकर अपने विचार व्यक्त करें।



दीपिका पादुकोण का फ़िल्म छपाक 10 जनवरी को रिलीज होने वाली है। जेएनयू में दीपिका पादुकोण को जाने को लेकर लोग फ़िल्म का बायकॉट कर रहे हैं तो कुछ समर्थन में खड़े हो गए हैं। आखिर फ़िल्म छपाक में क्या है ?


ये फिल्म एसिड अटैक सर्वाइवर लक्ष्मी अग्रवाल के जीवन से प्रेरित है। लक्ष्मी अग्रवाल कौन हैं? क्यों फिल्म की निर्देशक मेघना गुलजार ने फिल्म बनाने के लिए उनकी कहानी चुनी?


मध्यम वर्गीय परिवार से आने वाली लक्ष्मी का जन्म 1 जून 1990 को हुआ था। लक्ष्मी बचपन से ही गायक बनने के सपने देखती थीं। लेकिन, 15 साल की उम्र में उनके जीवन में एक अजीब मोड़ आया, जब 32 वर्षीय नईम की नजर लक्ष्मी पर पड़ी। नईम ने लक्ष्मी से शादी करने की इच्छा जताई। जवाब ‘न’ में मिला। इसके बाद उसने पूरे 10 महीने तक लगातार लक्ष्मी का पीछा किया। वह स्कूल जाती तो नईम रास्ते में उनका इंतजार करता। मन होने पर थप्पड़ मार देता, फब्तियाँ कसता…। शायद वह जानता था कि लक्ष्मी चाहकर भी उसकी बद्तमी़जियों के बारे में घर में नहीं बताएगी। क्योंकि, अगर उसने ऐसा किया तो नईम को कुछ कहने से पहले घर वाले लक्ष्मी का स्कूल जाना छुड़वा देते। उसके सपनों को समय से पहले मार दिया जाता। यह सोच वह अपने परिवार वालों के आगे चुप रही।


एक दिन लक्ष्मी को खान मार्केट जाते हुए नईम का फोन आया और उसने लक्ष्मी से पूछा कि तुम तो जिंदगी में कुछ करना चाहती हो, आगे बढ़ना चाहती, पढ़ना चाहती हो… है न? लक्ष्मी ने इस बार बड़ी सहजता से जवाब ‘हाँ’ में दिया और इसके बाद नईम ने कॉल काट दी। अगले दिन खान मार्केट जाने के रास्ते में लक्ष्मी को नईम और नईम के भाई की गर्लफ्रेंड इंतजार करते मिले। लेकिन, जब उन्हें देखकर लक्ष्मी ने रास्ता बदलने की कोशिश की तो वे उसका पीछा करने लगे। थोड़ी देर में रोड क्रॉस करते हुए वह लड़की उसका रास्ता घेर लेती है और नईम उस पर एसिड डाल देता है।


इस घटना के बाद लक्ष्मी वहीं सड़क पर पड़ी रही। एक टैक्सी ड्राइवर ने उसकी हालत देख गाड़ी रोकी और उसे सफदरजंग अस्पताल में भर्ती करवाया। लक्ष्मी कई महीनों तक अस्पताल में रही और कई सर्जरी हुई। इसके कारण कई महीनों तक वह अपना चेहरा नहीं देख पाई। परिवारवालों ने घर से शीशा फ्रेम हटा दिया था। लेकिन, एक दिन जब उसने शीशे में अपना चेहरा देखा तो डर गईं। आँख, नाक सब गायब हो चुके थे।


एसिड से झुलसने से भी ज्यादा पीड़ा लक्ष्मी को समाज का अपने प्रति रवैया देख हुई। मात्र 16 साल की उम्र में लक्ष्मी आत्महत्या करने की सोचने लगी। लेकिन कहते हैं न मुश्किल घड़ी ज्यादा समय तक नहीं टिकती। साल 2006 में उन्होंने भारत में एसिड बैन को लेकर पीआईएल डाली। केस लंबा चला, लेकिन कई लोगों के सहयोग से वे साल 2013 में इसे जीतने में सफल हुईं। इस जीत के बाद लक्ष्मी ने एसिड अटैक के ख़िलाफ़ मुहिम में शामिल हो गईं।