राजस्थान विधानसभा में नागरिकता संशोधन अधिनियम के विरुद्ध शासकीय संकल्प पारित

जयपुर। राज्य विधानसभा में शनिवार को नागरिकता (संशोधन) अधिनियम-2019 (सीएए) पर पुनर्विचार के लिए केन्द्र सरकार से आग्रह करने के शासकीय संकल्प को ध्वनिमत से पारित किया गया।




संसदीय कार्यमंत्री शांति कुमार धारीवाल ने शासकीय संकल्प पर चर्चा के दौरान कहा कि नागरिकता (संशोधन) अधिनियम-2019 का पूरे देश में व्यापक विरोध हो रहा है। इस संशोधन के कारण देश में हिंसा, उग्र प्रदर्शन तथा सार्वजनिक सम्पत्ति का नुकसान हो रहा है तथा इस वजह से देश में सामाजिक सद्भाव भी बिगड़ा है। उन्होंने कहा कि इस स्थिति को देखते हुये ही राज्य विधानसभा में यह संकल्प लाया गया है।

उन्होंने कहा कि धार्मिक आधार पर धुव्रीकरण कर वोटों की राजनीति से देश में धर्मनिरपेक्ष ढांचा टूटा है। उन्होंने कहा कि वास्तव में सीएए, एनपीआर तथा एनआरसी अलग-अलग नहीं होकर एक-दूसरे से जुड़े हुये हैं। उन्होंने कहा की अगर एनआरसी के मापदण्ड कठिन रहते हैं तो शणार्थियों को दस्तावेज लाने में मुश्किल रहेगी।

धारीवाल ने कहा की इस संशोधन अधिनियम में केवल पाकिस्तान, बांग्लादेश, तथा अफगानिस्तान के अल्पसंख्यक हिन्दू, सिख,जैन, बौद्ध, पारसी तथा ईसाइयों को ही शामिल किया गया है, जबकि मुस्लिम तथा यहूदियों को इससे बाहर रखा गया है। साथ ही इस अधिनियम में भारतीय सीमा से लगे हुए अन्य देश श्रीलंका, म्यांमार तथा भूटान के अल्पसंख्यकों के बारे में भी कोई जिक्र नहीं किया गया है। उन्होंने कहा कि हमारी सरकार ने कभी नहीं कहा कि शरणार्थियों को नागरिकता नहीं दी जाए लेकिन धर्म के आधार पर भेदभाव करना गलत है।

संसदीय कार्यमंत्री ने कहा कि इस संशोधन विधेयक से अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि धूमिल हुई है। उन्होंने कहा कि देश के संविधान के अनुसार एक आम आदमी को भी केन्द्र सरकार के किसी निर्णय के खिलाफ उच्चतम न्यायालय में जाने का हक है। उन्होंने कहा कि प्रदेश सरकार इस संकल्प के द्वारा केन्द्र सरकार से इस अधिनियम पर पुनर्विचार करने का आग्रह कर रही है।

धारीवाल ने कहा कि वर्ष 2016 से 2018 तक तीन साल में गत सरकार द्वारा केवल 577 लोगों को नागरिकता दी गई जबकि वर्तमान सरकार ने मात्र एक साल में ही 1200 लोगों को नागरिकता प्रदान की है।

संकल्प पर चर्चा के दौरान खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति मंत्री रमेश मीणा ने कहा कि नागरिकता (संशोधन) अधिनियम-2019 देश की धर्म निरपेक्षता की छवि के खिलाफ है। उन्होंने कहा कि इस अधिनियम द्वारा 6 धर्मों के लोगों को देश में अवैध प्रवास में शिथिलता दी गई है।

मीणा ने कहा कि अब तक नागरिकता अधिनियम में जो भी संशोधन हुए हैं, उनमें से कोई भी धर्म के आधार पर नहीं किया गया। उन्होंने कहा कि इस अधिनियम से देश में समानता के अधिकार का उल्लंघन हुआ है।

इससे पहले संसदीय कार्यमंत्री धारीवाल ने शासकीय संकल्प को विचार एवं पारण के लिए प्रस्तुत करते हुए कहा कि हमारे देश के संविधान की प्रस्तावना में यह स्पष्ट कथन है कि भारत एक पंथनिरपेक्ष देश है। यह संविधान की एक आधारभूत विशेषता है जिसे परिवर्तित नहीं किया जा सकता। इसके अतिरिक्त संविधान का अनुच्छेद 14 स्पष्ट रूप से यह निश्चित करता है कि राज्य, भारत के राज्यक्षेत्र में किसी व्यक्ति को विधि के समक्ष समता से या विधियों के समान संरक्षण से वंचित नहीं करेगा। तथापि, नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 2019 (सीएए), जिसे हाल ही में संसद द्वारा अधिनियमित किया गया है, का लक्ष्य धर्म के आधार पर अवैध प्रवासियों में विभेद करना है।

संसदीय कार्यमंत्री ने कहा कि धर्म के आधार पर लोगों में ऐसा विभेद संविधान में प्रतिष्ठित पंथनिरपेक्ष आदशोर्ं के अनुरूप नहीं है और यह स्पष्ट रुप से अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है। उन्होंने कहा कि वस्तुतः स्वतंत्रता के पश्चात देश के इतिहास में प्रथम बार कोई ऐसा कानून अधिनियमित किया गया है, जो लोगों में धर्म के आधार पर विभेद करता है। इससे देश का पंथनिरपेक्ष ताना बाना जोखिम में पड़ जाएगा। उन्होंने कहा कि इसके अतिरिक्त अन्य पड़ोसी देशों जैसे श्रीलंका, म्यांमार,नेपाल, भूटान इत्यादि देशों से आने वाले प्रवासियों के सम्बन्ध में नगारिकता संशोधन अधिनियम में कोई नवीन प्रावधान नहीं किया गया है। ऎसा क्यों किया गया है, इसकी आशंका भी जनमानस में है। यही कारण है कि नागरिकता (संशोधन) अधिनियम (सीएए) से देश भर में व्यापक विरोध हुआ है। राजस्थान राज्य में भी इस विधायन के विरूद्ध विरोध प्रदर्शन देखे गये हैं जो शांतिपूर्ण रहे हैं और जिनमें हमारे समाज के सभी वर्ग शामिल थे।

उन्होंने कहा कि इन तथ्यों की पृष्ठभूमि में, यह स्पष्ट है कि नागरिकता (संशोधन) अधिनियम संविधान के उपबंधों का उल्लंघन करता है, इसलिए नागरिकता प्रदान करने में धर्म के आधार पर किसी विभेद से बचने के लिए और भारत में समस्त धार्मिक समूहों के लिए विधि के समक्ष समता को सुनिश्चित करने के लिए, यह सदन भारत सरकार से नागरिकता (संशोधन) अधिनियम को निरसित करने के लिए आग्रह करने का संकल्प करता है।

धारीवाल ने कहा कि देश में लोगों के एक बड़े वर्ग में व्यापक आशंका है कि राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर), राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) की ही एक प्रस्तावना है, और नागरिकता (संशोधन) अधिनियम के माध्यम से किए गए हाल ही के संशोधन जो कि धार्मिक आधारों पर लोगों में विभेद करते हैं, जो व्यक्तियों के एक वर्ग को भारत की नागरिकता से वंचित करने के लिए बनाए गए हैं। उन्होंने कहा कि इसके अतिरिक्त, देश में रह रहे समस्त व्यक्तियों से चाही जाने वाली प्रस्तावित अतिरिक्त सूचना से बड़े पैमाने पर जनसंख्या को बड़ी असुविधा होने की संभावना है जिसका कोई वास्तविक लाभ नहीं होगा।

संसदीय कार्यमंत्री ने कहा कि आसाम राज्य इसका जीवंत उदाहरण है। इसलिए, यह सदन केन्द्रीय सरकार से आग्रह करने का भी संकल्प करता है कि केन्द्रीय सरकार को नागरिकता (संशोधन) अधिनियम को प्रतिसहृत करने के साथ-साथ, और इसलिए कि लोगों के मन में ऐसी आशकांओं को दूर किया जाए, ऐसी नई सूचनाओं, जिन्हें राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एन.पी.आर.), 2020 में अद्यतन करने के लिए चाहा गया है, को भी वापस लेना चाहिए, उसके पश्चात ही राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एन.पी.आर.) के अधीन गणना करने का कार्य हाथ में लेना चाहिए।