वाह रे चौरसिया कलयुगी पुत्र ! तूने तो कर दिया कमाल ?

वाह रे चौरसिया समाज का सुपुत्र ! तुमने तो कमाल ही कर डाला ?
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छतरपुर में रिश्तों को शर्मशार करने वाला एक ऐसा मामला सामने आया है, जो चौरसिया समाज के लिए शर्मनाक की बात है। जिस मां ने जिगर के टुकड़े को जीवन दिया उसने पिता की मौत के बाद पत्नी के कहने पर माँ वृद्धाश्रम छोड़ दिया। बात तो हद तब हो गई जब वृद्धाश्रम में रह रही मां की मौत के बाद बेटे ने उनका अंतिम संस्कार करने मना कर दिया। वो भी सिर्फ इसलिए कि बेटे की पत्नी नहीं चाहती थी कि पति अपनी मां की चिता को मुखाग्नि दे। जबकि युवक सरकारी नौकरी करता है और उसे ये नौकरी पिता की मौत के बाद अनुकंपा के बाद मिली है।



जानकारी के मुताबिक, 75 वर्षीय फूलवती चौरसिया की पिछले दिनों सोमवार सुबह वृद्धाश्रम में मौत हो गई।इसकी सूचना वृद्धाश्रम के लोगों ने फूलवती के बेटे रामखिलावन और बेटी पूजा को दी। लेकिन, बेटा न तो मां के अंतिम दर्शन करने आया और न उसने मां का अंतिम संस्कार करने की इच्छा जताई। ऐसे में मां के शव के पास खड़ी बेटी पूजा रोती रही। पूजा ने कहा कि भगवान ऐसा भाई किसी को नहीं दे। 
पूजा के अनुसार,  पिता की मौत के बाद बहुओं ने मेरी मां को घर से निकाल दिया था। 4 साल से वे वृद्धाश्रम में रह रही थीं। 
वृद्धाश्रम की वर्कर ने फूलवती की मौत के बाद परिजन को सूचना दी, लेकिन कोई उनका अंतिम संस्कार करने तैयार नहीं हुआ। जिसके चलते वृद्धाश्रम वालों ने रीति-रिवाज से उसका अंतिम संस्कार किया। वृद्धाश्रम के हेमंत ने मुखाग्नि दी।


बेटी पूजा ने बताया कि "मां को भाई और भाभी ने घर से निकाल दिया था। मैं ससुराल से कभी-कभार मिलने आ जाती थी। आज मां की मौत हो गई है। भाई ने भाभी के कहने पर मां का अंतिम संस्कार करने से मना कर दिया। भाभी ने धमकी दी है कि अगर वह मां का शव लेकर घर आएंगे, उनका मरा मुंह देखेंगे। घर से दो लाशें निकलेंगी।" पूजा कहती हैं कि "लानत है ऐसी बहुओं, बेटों, भाइयों पर...। भगवान! ऐसे भाई, बेटे, बहू किसी को न दे। चाहे बे-औलाद रखे।"


वहीं , वृद्धाश्रम के लोगों ने कहा कि फूलवती चौरसिया हमारे यहां पिछले कई वर्षों से रह रहीं थीं। उनकी परवरिश हम सब कर रहे थे। मौत के बाद इस स्थिति में हम लोगों ने अंतिम संस्कार किया है। वैसे भी जिनका कोई नहीं होता, उनका हम ही सब कुछ करते हैं। वह तो इनके बच्चे थे, तो इन्हें सूचना दी कि अगर आप लोग अंतिम दर्शन और संस्कार करना चाहते हों तो करें। इन्होंने मना कर दिया तो हम लोगों ने किया।
ऐसे शर्मनाक घटना पर समाज दुःखी है। जिस बेटे को बाप की नौकरी पर अनुकंपा नौकरी मिली उसने पहले माँ को घर से निकाला और मरने पर अंतिम संस्कार तो क्या , दर्शन करने से भी इंकार कर दिया, वह भी पत्नी के डर, भय से। धन्य है ऐसे सुपुत्र !