शक्ति और शिव का संयुक्त रूप है शिवलिंग


विश्व की संपूर्ण ऊर्जा ही लिंग की प्रतीक है। वस्तुत: यह संपूर्ण सृष्टि बिंदु-नाद स्वरूप है।


ब्रह्मांड का प्रतीक ज्योतिर्लिंग= शिवलिंग का आकार-प्रकार ब्रह्मांड में घूम रही हमारी आकाशगंगा की तरह है। 


यह शिवलिंग हमारे ब्रह्मांड में घूम रहे पिंडों का प्रतीक है, शिवलिंग का अर्थ है भगवान शिव का आदि-अनादी स्वरूप।


बिंदु अर्थात ऊर्जा (शक्ति) और नाद अर्थात ध्वनि (शिव), अर्थात शक्ति और शिव का संयुक्त रूप ही तो शिवलिंग में अवस्थित है। यही दो संपूर्ण ब्रह्मांड का आधार है। “इसी कारण प्रतीक स्वरूप शिवलिंग की पूजा-अर्चना की जाती है।“ 


शून्य, आकाश, अनन्त, ब्रह्माण्ड और निराकार परमपुरुष का प्रतीक होने से इसे लिंग कहा गया है। -(स्कन्दपुराण; वायु पुराण)


आकाश स्वयं लिंग है। धरती उसका पीठ या आधार है और सब अनन्त शून्य से पैदा हो उसी में लय होने के कारण इसे लिंग कहा है।



वातावरण सहित घूमती धरती या सारे अनन्त ब्रह्माण्ड (ब्रह्माण्ड गतिमान है) का अक्स/धुरी ही लिंग है। 


पुराणों में शिवलिंग को कई अन्य नामों से भी संबोधित किया गया है जैसे- प्रकाश स्तंभ लिंग, अग्नि स्तंभ लिंग, उर्जा स्तंभ लिंग, ब्रह्माण्डीय स्तंभ लिंग आदि।


वेदानुसार “ज्योतिर्लिंग” = ज्योतिर्लिंग उत्पत्ति के संबंध में पुराणों में अनेक मान्यताएं प्रचलित हैं


यानी 'व्यापक ब्रह्मात्मलिंग' जिसका अर्थ है 'व्यापक प्रकाश'। जो शिवलिंग के 12 खंड हैं। शिवपुराण के अनुसार ब्रह्म, माया, जीव, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी को ज्योतिर्लिंग या ज्योति पिंड कहा गया है।


वेदों और वेदान्त में लिंग शब्द सूक्ष्म शरीर के लिए आता है। लिंग के मूल में ब्रह्मा, मध्य में विष्णु और ऊपर प्रणवाख्य महादेव स्थित हैं। भगवान शिव ने ब्रह्मा और विष्णु के बीच श्रेष्ठता को लेकर हुए विवाद को सुलझाने के लिए एक दिव्य लिंग (ज्योति) प्रकट किया था। इस लिंग का आदि और अंत ढूंढते हुए ब्रह्मा और विष्णु को शिव के परब्रह्म स्वरूप का ज्ञान हुआ। इसी समय से शिव के परब्रह्म मानते हुए उनके प्रतीक रूप में लिंग की पूजा आरंभ हुई।


शिव के बारह ज्योतिर्लिंग भी अवतारों की ही श्रेणी में आते हैं! ये बारह ज्योतिर्लिंग हैं-


1. सौराष्ट्र में 'सोमनाथ'(गुजरात, सौराष्ट्र)


2. श्रीशैल में 'मल्लिकार्जुन'(आंध्र प्रदेश, कुर्नूल)


3. उज्जयिनी में 'महाकालेश्वर'(मध्य प्रदेश, उज्जैन) 


4. ओंकार में 'अम्लेश्वर / ओंकारेश्वर'(मध्य प्रदेश, नर्मदा नदी में एक द्वीप पर) 


5. हिमालय में 'केदारनाथ'  (उत्तराखंड, केदारनाथ)


6. डाकिनी में 'भीमेश्वर'(महाराष्ट्र, भीमाशंकर)


7. काशी में 'विश्वनाथ' उत्तर प्रदेश, वाराणसी) 


8. गोमती तट पर 'त्र्यम्बकेश्वर'  (महाराष्ट्र, त्रयम्बकेश्वर नासिक के निकट)


9. चिताभूमि में 'वैद्यनाथ'(झारखंड, देवघर) 


10. दारुक वन में 'नागेश्वर'(गुजरात, दारुकावन, द्वारका)


11. सेतुबन्ध में 'रामेश्वर' (तमिलनाडु, रामेश्वरम)


12. शिवालय में 'घुश्मेश्वर' (महाराष्ट्र, औरंगाबाद)


वैज्ञानिक कारणों का सबूत:


1. आईंसटीन का सूत्र : अब जरा आईंसटीन का सूत्र देखिये जिस के आधार पर परमाणु बम बनाया गया, परमाणु के अन्दर छिपी अनंत ऊर्जा की एक झलक दिखाई जो कितनी विध्वंसक थी सब जानते हैं। 


“e / c = m c {e=mc^2}“


इसके अनुसार पदार्थ को पूर्णतयः ऊर्जा में बदला जा सकता है अर्थात दो नहीं एक ही है पर वो दो हो कर स्रष्टि का निर्माण करता है। हमारे ऋषियो ने ये रहस्य हजारो साल पहले ही ख़ोज लिया था। हम अपने देनिक जीवन में भी देख सकते हैं कि जब भी किसी स्थान पर अकस्मात् उर्जा का उत्सर्जन होता है तो उर्जा का फैलाव अपने मूल स्थान के चारों ओर एक वृताकार पथ में तथा ऊपर व निचे की ओर अग्रसर होता है अर्थात दशोदिशाओं (आठों दिशों की प्रत्येक डिग्री (360 डिग्री)+ऊपर व निचे) होता है, फलस्वरूप एक क्षणिक “शिवलिंग आकृति” की प्राप्ति होती है जैसे बम विस्फोट से प्राप्त उर्जा का प्रतिरूप।


2. Bigbang Theory: 


स्रष्टि के आरम्भ में महाविस्फोट (bigbang) के पश्चात् उर्जा का प्रवाह वृत्ताकार पथ में तथा ऊपर व नीचे की ओर हुआ फलस्वरूप एक महाशिवलिंग का प्राकट्य हुआ। जिसका वर्णन हमें लिंगपुराण, शिवमहापुराण, स्कन्द पुराण आदि में मिलता है।
    
                                  


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